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हाथी अब नहीं रहे साथी!

– गुस्सैल हाथियों को रोकने के लिए रामनगर वन प्रभाग की ओर से पिछले दिनों को कुछ जरूरी कदम उठाए गए हैं। लोगों की मांग पर सड़क के दोनों ओर गढ्ढे-खाई जैसे बना दिए हैं। जिससे हाथी सड़क पर न आ सकें। उन्हें डराने के लिए पटाखे लगाए गए हैं।

हिल-मेल ब्यूरो, रामनगर

हाथियों के रास्ते में इंसानी मौजूदगी ने जंगल के शांत स्वभाव वाले विशालकाय प्राणी को गुस्सैल बना दिया है। अमूमन अपने झुंड में रहने वाले हाथी एकांतप्रिय होते हैं और अपने तय रास्तों पर चलना पसंद करते हैं। लेकिन जंगल से हाथियों के हमलावर होने की ख़बरें आ रही हैं। इंसानों के साथ उनका नाता पहले जैसा नहीं रहा।

रामनगर वन प्रभाग में एक पखवाड़े से अधिक समय से हाथियों द्वारा हिंसक घटनाओं की ख़बरें आ रही हैं। जंगल के नज़दीक रहने वाले लोग डरे हुए हैं। किसानों के लिए अपने खेतों में काम करना मुश्किल हो रहा है। रामनगर वन प्रभाग के डीएफओ बीपी सिंह कहते हैं कि हाथियों के बढ़ते आतंक से निपटने के लिए हर संभव उपाय किये जा रहे हैं। हाथी नुकसान पहुंचा रहे हैं लेकिन उनके क्षेत्र में कोई मृत्यु नहीं हुई है।

पिछले एक महीने से यहां हाथियों का आतंक बढ़ा है। डीएफओ बीपी सिंह बताते हैं कि 10-12 जंगली हाथियों का समूह है जो उत्पात मचा रहा है और रिहायशी इलाकों की ओर रुख़ कर रहा है। इनमें एक टस्कर हाथी को चिन्हित किया गया है, जिसे रेस्क्यू करने के लिए राज्य के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक जय राज को पत्र लिखा गया है। टस्कर को पकड़कर किसी दूसरे क्षेत्र में छोड़ने की योजना है। इससे शायद दूसरे हाथी भी शांत हो जाएं। उनके मुताबिक इस समूह में हाथियों के बच्चे भी हैं। बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए भी हाथी अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं और रास्ते में पड़ने वाले इंसानों के प्रति आक्रामक रुख़ अख्तियार कर रहे हैं।

बीपी सिंह कहते हैं कि जंगल पर पहला अधिकार तो हाथियों का ही है। हाथी अपने ही रास्ते पर चल रहे हैं। उनके रास्ते में इंसानी घुसपैठ बढ़ गई है। वे बताते हैं कि रामनगर में आमदंडा से मोहान क्षेत्र तक हाथियों का आतंक अधिक है। उससे आगे की भी कुछ जगहें प्रभावित हैं। उनके मुताबिक जून में पर्यटकों की संख्या भी इस रूट पर अधिक थी। फिर राज्य हाईवे के चलते यहां वाहनों की आवाजाही भी है। लोग गाड़ियों में खाने पीने की चीजें साथ लेकर चलते हैं। रास्ते में इधर-उधर खाने की चीजें फेंक देते हैं। इसकी वजह से हाथियों को इस तरह के भोजन की आदत पड़ गई है। उन्हें पता है कि सड़क की ओर या रिहायशी इलाकों की ओर कुछ न कुछ खाने को मिल जाएगा। इसलिए वे उधर रुख़ करते हैं। डीएफओ बीपी सिंह के मुताबिक हाथी ज्यादातर भोजन के लालच में आ रहे हैं।

गुस्सैल हाथियों को रोकने के लिए रामनगर वन प्रभाग की ओर से पिछले दिनों को कुछ जरूरी कदम उठाए गए हैं। बीपी सिंह कहते हैं कि लोगों की मांग पर सड़क के दोनों ओर गढ्ढे-खाई जैसे बना दिए हैं। जिससे हाथी सड़क पर न आ सकें। उन्हें डराने के लिए पटाखे लगाए गए हैं। रिहायशी इलाकों में लोग ढोल-नगाड़े से लोग आवाज़ कर उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं। जुलाई की शुरुआत में वन विभाग के कर्मचारियों ने 11 बजे से 1 बजे तक रिहायशी इलाकों की ओर मशालें जलाईं। इसके साथ ही आटे में मिर्च का पाउडर मिलाकर डाला गया। ताकि हाथी को इंसानों के खाद्य पदार्थों से डर लगे और वो उस क्षेत्र में आने से बचे। इसके साथ ही जगह जगह हाथियों से सावधान रहने के बोर्ड भी लगाए गए हैं।

रामनगर रेंज के डीएफओ बीपी सिंह के मुताबिक लोग हाथियों को भोजन तो देते ही हैं, उनके साथ सेल्फी लेने के चक्कर में गाड़ियों से उतर जाते हैं। वीडियो बनाने लगते हैं। हाथी के पास जाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में हाथी भी अपनी तरह से प्रतिक्रिया देता है। उन्होंने बताया कि हाथियों से प्रभावित रास्ते में वन विभाग की टीमें तैनात हैं, इसलिए जानमाल का खतरा नहीं है, लेकिन ये स्थिति बहुत दिनों तक तो रह नहीं सकती है। इसलिए टस्कर हाथी को पकड़ना बहुत जरूरी है। ताकि लोगों को सुरक्षित किया जा सके।

रामनगर ही नहीं हाथियों के हमलावर होने की ख़बरें अन्य जगहों से भी आ रही हैं। रुद्रपुर में हाथी ने एक किसान को मार डाला। बरेली में नेपाल से आए हाथियों का आतंक है। वहां हाथियों ने एक किसान को हमला कर मार डाला, फिर एक व्यक्ति और उसके कुत्ते को कुचल कर मार डाला। नेपाल से आए इन हाथियों के आतंक से निपटने के लिए उत्तराखंड वन विभाग, जिम कार्बेट नेशनल पार्क, वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और पीलीभीत टाइगर रिजर्व की टीमें मिलकर कार्य कर रह हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड की ओर भेजने की कोशिश की जा रही है।

लेकिन हाथी तो नेपाल, उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश की सीमा नहीं जानते, उनके लिए कोई सीमा नहीं है, वे अपने ही रास्तों पर चल रहे हैं। दिक्कत ये है कि जंगल के इस बड़े जीव के रास्ते पर इंसान कब्जा कर रहे हैं। उसके चलने-फिरने की जगह कम हो गई है। इसके चलते वन्यजीव और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। हाथी अपनी जगह चलना चाहता है।

हाथियों और बाघों के बीच भी बढ़ रहा संघर्ष

उत्तराखंड के कार्बेट टाइगर रिजर्व में बाघों और हाथियों की अधिक संख्या वन्य जीवन के लिहाज से ख़ुशी की बात तो है, इसके साथ ही ये यहां वन्य जीवों के बेहतर प्रबंधन की मांग भी करती है। क्षेत्र की तुलना में संख्या अधिक होने से बाघों में आपसी संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। बाघ और हाथियों के बीच भी संघर्ष बढ़ रहा है। भोजन की खातिर हाथियों के बच्चे बाघों के लिए आसान शिकार बन रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक कार्बेट में वन्यजीवों की सघनता देखते हुए बाघों और हाथियों को दूसरे नेशनल पार्क में शिफ्ट किया जाना, एक विकल्प हो सकता है, ताकि इस तरह के संघर्ष को रोका जा सके।

27 मई को आपसी संघर्ष में कार्बेट टाइगर रिजर्व में बाघिन की मौत हुई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि बाघ से संघर्ष के बाद उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। जिससे वो चलने-फिरने, शिकार करने, यहां तक कि भोजन-पानी लेने में भी असमर्थ हो गई थी। संघर्ष के चार दिन बाद बाघिन की मौत हुई। रिपोर्ट में डिहाईड्रेशन के चलते मौत की वजह सामने आई।

इस बाघिन की मौत के बाद कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक संजीव चतुर्वेदी ने पिछले पांच वर्षों में मारे गए बाघों, हाथियों और गुलदारों की मौत को लेकर ये अध्ययन कराया। रिपोर्ट तैयार करने के लिए फील्ड स्टाफ से बातचीत, पोस्ट मार्टम रिपोर्ट और घटनास्थलों की दोबारा जांच की गई।

इस अध्ययन के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ रेंज में दो बाघ मारे गए, जबकि रामनगर रेंज में सात बाघ मारे गए। इसी तरह कालागढ़ रेंज में 13 हाथियों की मौत हुई, जबकि रामनगर रेंज में आठ हाथियों की मौत हुई। दोनों रेंज में तीन-तीन गुलदार मारे गए।

21 हाथियों की मौत में चौंकाने वाली बात ये है कि 60 फीसदी मौत (13 मामले) बाघों के हमले से हुई। उनमें भी ज्यादातर युवा हाथी थे। निदेशक संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक, बाघों के व्यवहार में ऐसा परिवर्तन इसलिए भी संभव है क्योंकि हाथी के बच्चों का शिकार करने में कम ऊर्जा लगती है, जबकि सांभर या चीतल जो कि बाघों का प्रिय भोजन हैं, उनके शिकार में अधिक दौड़ लगानी पड़ती है। फिर हाथियों के बच्चों के शिकार में कम मेहनत में अधिक भोजन उपलब्ध हो जाता है। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में भी जहां हाथी की मौत आपसी संघर्ष में हुई, बाघों ने उन्हें अपना निवाला बनाया। संजीवइस पर और अधिक अध्ययन की बात कहते हैं। हाथियों की मौत के अन्य मामले आपसी संघर्ष के हैं।

बाघों की मौत को लेकर संजीव चतुर्वेदी बताते हैं कि नौ में से सात मामलों में आपसी संघर्ष की बात सामने आई है। इसकी एक मुख्य वजह क्षेत्र पर अधिकार को लेकर जंग भी है। इसके अलावा एक बाघ की मौत जंगली सूअर के साथ आपसी संघर्ष में हुई। साही (पॉर्क्यूपाइन) के साथ संघर्ष में भी एक बाघ मारा गया।

गुलदारों की मौत के पीछे भी ज्यादातर बाघों के हमले की बात सामने आई। निदेशक संजीव चतुर्वेदी कहते हैं कार्बेट की स्थिति देश के अन्य टाइगर रिजर्व की तुलना में अलग है। यहां बाघ और हाथी, दोनों की संख्या अधिक है। करीब 1300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले कार्बेट पार्क में 250 बाघ हो सकते हैं। उनके मुताबिक पिछली बार की गिनती 215 बाघ थे। इस बार की गणना में बाघों की संख्या में इजाफा हो सकता है और करीब 250 बाघों का अनुमान है। एक नर बाघ 10 से 15 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में अधिकार पूर्वक रहता है। इस लिहाज से भी बाघों की टैरेटरी कम पड़ रही है।

कार्बेट में बाघों के साथ करीब 1000 से अधिक एशियाटिक हाथी हैं। इतनी अच्छी संख्या में हाथी और बाघ की मौजूदगी कार्बेट को दूसरे टाइगर रिजर्व से अलग बनाती है। कान्हा या रणथंभौर टाइगर रिजर्व पूरी तरह बाघों का इलाका है। इसीलिए कार्बेट में बाघी और हाथी के बीच भी टकराव के मामले सामने आ रहे हैं।

इस संघर्ष को रोकने के लिए क्या ऐहतियात उठाए जाने चाहिए। इस पर कार्बेट के निदेशक कहते हैं कि बाघों का क्षेत्र बढ़ाने की जरूरत है। लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है। जंगल के पास रहने वाले लोग इसके खिलाफ हो जाते हैं। क्योंकि जंगल के ईर्दगिर्द एक किलोमीटर तक लोगों की गतिविधियां प्रतिबंधित हो जाती हैं।

हालांकि राजाजी टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। इसलिए कार्बेट से बाघों को ट्रांस-लोकेट कर राजाजी लाना एक उपाय हो सकता है। संजीव कहते हैं कि हमने बाघ और हाथियों के बीच संघर्ष के बारे में नहीं सोचा था। कार्बेट में बाघों के शिकार को लेकर वे कहते हैं कि कार्बेट में सर्विलांस और पेट्रोलिंग बेहद अच्छी है और पिछले दस सालों में किसी बड़े वन्यजीव के शिकार का मामला यहां सामने नहीं आया।

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