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बेलगाम पर्यटन न पड़ जाए पर्यावरण पर भारी

पर्यटन स्थलों की कैपेसिटी को लेकर कभी कोई शोध नहीं किया गया। कभी यह पता लगाने की कोशिश नहीं हुई कि जिस हिल स्टेशन पर सैलानी जा रहे हैं, उसकी वेस्ट मैनेजमेंट की क्षमता क्या है। पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित करने को लेकर नीति की कमी नजर आती है।

वर्षा सिंह, देहरादून

देश के मैदानी हिस्सों में पड़ रही प्रचंड गर्मी और छुट्टियों की वजह से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में देशभर से बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचे। चार धाम समेत नैनीताल, मसूरी में पर्यटकों के ठहरने के लिए जगह मिलने में दिक्कतें आई। चमोली में तो पर्यटकों को ठहराने के लिए स्कूलों में अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ी। देहरादून के बाहरी हिस्सों में भी बड़ी संख्या में पर्यटकों के पहुंचने से स्थिति को संभालना मुश्किल हो गया। यात्रा मार्गों पर गाड़ियों की लंबी कतार और ट्रैफिक जाम होने के चलते अव्यवस्था की स्थिति पैदा हुई। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और मुख्य सचिव तक को यातायात सुधारने और पर्यटकों के लिए जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए दखल देना पड़ा।

दीपा रौथाण नौकरी के सिलसिले में रोज़ाना ऋषिकेश से देहरादून की यात्रा करती हैं। उनका कहना है कि दिल्ली और दूसरे राज्यों से आए पर्यटकों की भीड़ इतनी अधिक बढ़ गई है कि जो सफर एक घंटे में पूरा होता था, अब उसमें दो घंटे से अधिक समय लग रहा है। तेज़ धूप की वजह से ये यात्रा और उलझनभरी हो गई। लखनऊ से एक हफ्ते की छुट्टी पर परिवार समेत देहरादून आईं शशि अरोड़ा कहती हैं कि देहरादून के नेचुरल पार्क लच्छीवाला में ट्रैफिक जाम के चलते उन्हें वापस लौटना पड़ा। अगले दिन फिर वो किसी तरह लच्छीवाला पहुंच गईं लेकिन वहां भीड़ और ट्रैफिक जाम इतना था कि लौटते समय पार्क के अंदर ही गाड़ी में दो घंटे फंसे रह गए।
गंगोत्री-यमुनोत्री-केदारनाथ-बदरीनाथ में भी अव्यवस्थाओं का बुरा हाल हो गया है। इतनी बड़ी संख्या में पर्यटकों को संभालना सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर रहा है। ट्रैफिक जाम के साथ ही,पानी, शौचालय, पेट्रोल-डीज़ल की कमी, एटीएम में कैश की कमी, होटलों में रुकने के लिए जगह नहीं, साथ ही चिकित्सा इंतज़ाम भी नाकाफी साबित हो गए।

केदारसभा के अध्यक्ष विनोद शुक्ला बताते हैं कि जून के महीने में केदारनाथ में रोजाना 20 से 30 हज़ार पर्यटक दर्शन के लिए पहुंच रहे थे। जबकि यहां सरकारी धर्मशालाओं में 5 हजार पर्यटकों के ही रुकने की व्यवस्था है। इसके साथ ही तीर्थ पुरोहितों के घरों में भी यात्रियों को ठहराया गया। होटलों, धर्मशालाओं, तीर्थ पुरोहितों के घरों को मिलाकर भी 20 हजार से अधिक यात्रियों के ठहराने की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में इंतजामों का नाकाफी होना जायज़ ही है।

बदरीनाथ और हेमकुंड साहिब के दर्शन के लिए आए पर्यटकों की बड़ी संख्या के चलते जोशीमठ में होटलों, धर्मशालाओं और गुरुद्वारों में ठहरने की जगह नहीं बची। जिसकी वजह से जिला प्रशासन ने यात्रियों को संस्कृत महाविद्यालय और राजकीय इंटर कॉलेज में ठहराया।

चमोली में अत्यधिक पर्यटक पहुंचने से पेट्रोल-डीज़ल की खपत बढ़ गई और दो दिन फ्यूल के लिए वाहनों की लंबी कतार लग गई। जिलाधिकारी ने पेट्रोलपंपों को 24 घंटे खुले रखने के आदेश जारी किए।

मानसून से पहले जून के महीने में पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी की उम्मीद सरकार भी करती है। लेकिन इतनी अप्रत्याशित भीड़ पहुंच जाएगी, कि उन्हें संभालने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर कम पड़ जाएगा, ये उम्मीद किसी को नहीं थी। पर्यटन को उद्योग का दर्जा देने वाले राज्य में पर्यटकों की इतनी संख्या को संभालना मुश्किल हो गया। पर्यटकों के लिए किए गए इंतज़ाम नाकाफी साबित होने लगे। गंगोत्री-यमुनोत्री, बदरीनाथ-केदारनाथ, मसूरी, देहरादून, नैनीताल, हर तरफ से अफरातफरी की खबरें मिलने के बाद जून के दूसरे हफ्ते में मुख्यमंत्री से लेकर मुख्य सचिव तक सतर्क हो गए और पर्यटकों को असुविधा न हो, इसके आदेश जारी किए जाने लगे।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि इस वर्ष अनुमान से बहुत अधिक श्रद्धालु और पर्यटक उत्तराखंड में आए हैं। पिछले वर्ष की तुलना में ढाई-तीन गुना तक पर्यटक आए हैं। उन्होंने कहा कि पर्यटकों की बढ़ती संख्या को राज्य के युवाओं के लिए एक अच्छे अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए। हालांकि इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य पर्यटन सुविधाएं विकसित करने पर और अधिक ध्यान देना होगा।

पर्यटन का पर्यावरणीय आंकलन जरूरी

हिमालयी पहाड़ियों के बीच सर्पीली सड़कें नहीं, गाड़ियों की कतार की कई किलोमीटर लंबी रेखा खिंच गई थी। इन तस्वीरों से ये समझना जरूरी हो गया था कि हमें पर्यटन को नियंत्रित करना होगा। इसके पैमाने तय करने होंगे। साथ ही संवेदनशील पारिस्थितकीय तंत्र वाली जगहों पर पर्यटन के पर्यावरणीय असर को भी मापना होगा। अफसोस की बात ये है कि राज्य ने कभी इस दिशा में कोशिश ही नहीं की, न ही ऐसा कोई सिस्टम है, जिससे माप सकें कि केदारनाथ या जोशीमठ की हवा में पिछले दस वर्षों में किस तरह के बदलाव आए हैं। वहां प्रदूषण का स्तर क्या है। पर्यटन किस तरह पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है।

हिल स्टेशन की वहन क्षमता आंकनी होगी

अल्मोड़ा में जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन इकोलॉजी एंड सस्टेनबल डेवलपमेंट के डॉ. जेसी कुनियाल ने हिमाचल के कुल्लू-मनाली में पर्यटन के पर्यावरीय प्रभाव पर शोध किया है। अब वे अल्मोड़ा में आ गए हैं। उत्तराखंड की स्थिति को देखकर डॉ. कुनियाल कहते हैं कि सबसे पहले तो हमें यही पता लगाना चाहिए कि किस स्पॉट पर कितनी संख्या में पर्यटक जाने चाहिए।

इसके लिए सबसे पहले ये जानना होगा कि पर्यटकों को ठहराने की क्षमता कितनी है। मूलभूत सुविधाओं की क्या व्यवस्था है। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर के लिहाज़ से कैरिंग कैपिसिटी (वहन क्षमता) कितनी है। कोई हिल स्टेशन कितने लोगों को एक समय में एक साथ संभाल सकता है। यदि उस जगह की वहन क्षमता से अधिक लोग आ गए तो अफरातफरी की स्थिति पैदा होगी।

जैसे केदारनाथ में एक साथ पांच हज़ार लोगों को ठहराने की व्यवस्था है और वहां 20 से 30 हज़ार पर्यटक एक समय में मौजूद हों तो क्या होगा। ऐसे में जो पर्यटक वहां आएंगे वे नेगेटिव इम्पैक्ट लेकर जाएंगे। डॉ. कुनियाल कहते हैं कि ये भी समझना होगा कि उस हिल स्टेशन की वेस्ट मैनेजमेंट की क्या क्षमता है। यदि मान लीजिए एक पर्यटक रोजाना ढाई सौ ग्राम कचरा पैदा कर रहा है, तो उसको मैनेज करने की क्या तकनीक हमारे पास है, या फिर हम उस वेस्ट को ऐसे ही किसी डंपिंग साइट पर उड़ेल रहे हैं।

ऐसे ही वाहनों के लिहाज़ से किसी जगह की क्या वहन क्षमता है। क्योंकि अब ज्यादातर पर्यटक अपनी बड़ी गाड़ियों से ही सफ़र कर रहे हैं। तो वाहनों से निकल रहे धुएं से हिमालयी हवा में पीएम 2.5 और पीएम10 के स्तर में क्या बदलाव आया। डॉ. कुनियाल कहते हैं कि इन पैरामीटर को कैरिंग कैपेसिटी के रूप में देखा जाना चाहिए। फिर हमारा पर्यावरण इस पर्यटन से किस तरह प्रभावित हो रहा है। इतनी बड़ी संख्या में पर्यटकों की मौजूदगी से तापमान पर क्या असर पड़ रहा है। जो औषधीय पौधे उग रहे हैं, जो नए पौधे उग रहे हैं, कहीं उन्हें तो नुकसान नहीं पहुंच रहा है।

ये भी जानने की जरूरत है कि पर्यटन का लैंड यूज़ पर क्या असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि हिमाचल में वर्ष 1965 तक सेब के बगीचे कुल्लू घाटी में समुद्र तल से 1000 मीटर की ऊंचाई पर होते थे। लेकिन अब सेब का उत्पादन 2000 मीटर की ऊंचाई पर पहुंच गया है। कुल्लू मनाली पर किए उनके शोध में ये बात सामने आई है कि हिमाचल और उत्तराखंड में पर्यावरणीय प्रभावों के चलते लैंड यूज़ बदल गए हैं।

साथ ही बर्फ़ का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। तापमान में इजाफे की वजह से जो बर्फ गिरती भी है, वो टिकती नहीं है। वे समझाते हैं कि मानवीय गतिविधियां, पर्यटन, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। हम जलवायु परिवर्तन पर तो चिंता जताते हैं लेकिन जो मूल समस्याएं हैं, उस पर ध्यान नहीं देते।

डॉ. कुनियाल कहते हैं कि हमें ये भी समझना होगा कि इस पर्यटन से राज्य को कितना फायदा पहुंच रहा है। कोई फायदा मिल भी रहा है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अमीर और अमीर होते जा रहा है और गरीब और गरीब हो रहा है। क्या इस पर्यटन से स्थानीय लोगों को कोई फायदा पहुंच रहा है।

मास टूरिज्म को इको टूरिज्म में बदलने की जरूरत

डॉ. जेसी कुनियाल कहते हैं कि हमें मास टूरिज्म को इको टूरिज्म में बदलने की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर चमोली के फूलों की घाटी में एक समय में एक हजार से अधिक पर्यटक नहीं भेजते। वैसे ही हमें किसी भी हिल स्टेशन पर पर्यटकों का रजिस्ट्रेशन करके उनकी संख्या को नियंत्रित करना होगा। इसके साथ ही जो मशहूर पर्यटन स्थल हैं, उनके आसपास बसी जगहों और गांवों को पर्यटन के लिहाज से विकसित करना होगा।

विलेज टूरिज्म से लोगों को होगा फायदा

डॉ. कुनियाल कहते हैं कि हमें विलेज टूरिज्म को बढ़ावा देना होगा। जिससे इसका फायदा स्थानीय लोगों को भी मिल सके। मिसाल के तौर पर टिहरी में नागटिब्बा या बकरी गांव का कॉनसेप्ट। इससे जो पर्यटक इन जगहों पर पहुंचते हैं, वे शांत हिमालयी वातावरण के साथ, ट्रैकिंग और पहाड़ी गांवों के जीवन को देखते हैं। उनके भोजन को चखते हैं। इसका संचालन खुद गांव वाले करते हैं। उत्तराखंड में नागटिब्बा समेत कुछ अन्य जगहें भी इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। पिथौरागढ़ का सिरोही गांव भी इसकी मिसाल है। जहां महिलाएं होमस्टे के ज़रिये अच्छी आर्थिक आमदनी हासिल कर रही हैं।

वैकल्पिक टूरिस्ट स्पॉट विकसित करने होंगे

इसके साथ ही नए पर्यटन स्थल विकसित करने पर ध्यान देना होगा। यानी पर्यटन स्थलों का विकेंद्रीकरण करना होगा। मसूरी के साथ ही उसके ईर्दगिर्द की जगहों पर जैसे धनौल्टी, यमुना घाटी में पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए। डॉ कुनियाल कहते हैं कि सैटेलाइट टूरिस्ट स्पॉट को देखने की जरूरत है। इससे वहां रहने वाले लोगों को भी फायदा पहुंचेगा। ये सुनियोजित तरीके से होगा। इस तरह पर्यावरण संरक्षण भी किया जा सकेगा।

13 नए डेस्टीनेशन पर चल रहा काम

राज्य सरकार ने इस ओर कदम बढ़ाया भी है। 13 जिले 13 पर्यटन स्थल पर कार्य किया जा रहा है। ताकि हर जिले में एक-एक स्पॉट को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सके। पिछले वर्ष 13 नए पर्यटन स्थलों को चिन्हित किया गया।

देहरादून –लाखामंडल
नैनीताल–मुक्तेश्वर
अल्मोड़ा–सूर्य कटारमल मंदिर
चमोली–गैरसैंण भराड़ीसैंण
हरिद्वार–भगवती 52 शक्तिपीठ
उत्तरकाशी–मोरी-हर की-दून पार्क
रुद्रप्रयाग–चिरबटिया
बागेश्वर –गरुड़वैली
चंपावत–देवीधुरा
पौड़ी–सतपुली खैरासैंण
ऊधमसिंहनगर–द्रोण सागर झील
पिथौरागढ़–मोस्टामानू
टिहरी–टिहरी झील

राज्य के पर्यटन विकास परिषद के निदेशक एनएस क्यूरीलाल कहते हैं कि राज्य के 13 नए पर्यटन स्थलों को विकसित करने के लिए तेज़ी से कार्य किया जा रहा है। ताकि पर्यटक आसपास की दूसरी जगहों की ओर आकर्षित हों और किसी एक जगह पर दबाव न पड़े। उनसे ये पूछने पर कि पर्यटन से राज्य को कितना फायदा पहुंचता है, कितनी आमदनी होती है, इसका ठीक-ठीक आंकलन नहीं किया गया है।

पर्वतीय क्षेत्रों को भी प्रदूषण मापने के यंत्रों की जरूरत

राज्य में प्रदूषण मापने के लिए उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सिस्टम देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, हल्द्वानी, काशीपुर और रुद्रपुर में ही हैं। जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी ज्यादा जरूरत है। ये वर्ष पर्यटन के लिहाज से उत्तराखंड के लिए अहम रहा है और आने वाले वर्षों में पर्यटक और पर्यटन को संभालने के लिए कई हिदायतें दे रहा है। राज्य को नई पर्यटन नीति की जरूरत है। उसके पर्यावरणीय आंकलन की जरूरत है।

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