सरोकार

यमुना घाटी का लाल स्थानीय उत्पादों से कर रहा कमाल

नरेश नौटियाल लगभग 550 ऐसे मझौले किसानों से सीधे जुड़े हैं, जो कम से कम एक और अधिक से अधिक 10 कुंतल अलग-अलग प्रकार की नगदी फसलों का उत्पादन करते हैं। वह इन उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराते हैं। किसानों को उनके घर पर अपने उत्पादन का पैसा मिल जाता है।

प्रेम पंचोली

अलग उत्तराखंड बनने के लगभग दो दशक होने को हैं। बावजूद इसके पहाड़ से पलायन का इलाज नहीं खोजा जा सका है। रोजगार की तलाश में पलायन करने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। ये किस तरह का पलायन है, स्वैच्छिक पलायन या मजबूरी का पलायन, ये सवाल सबके सामने खड़े हैं। इनके जवाब खोजने के लिए सरकारें लगातार काम कर रही है। मगर राज्य बनने के बाद पलायन निरंतर जारी है। दूसरी तरफ देखें तो कुछ लोग पलायन को कोई समस्या नहीं मान रहे है। वे कहते हैं कि इस पहाड़ में वे सभी प्राकृतिक साधन उपलब्ध है जिससे स्वरोजगार पाया जा सकता है। दर्जनो युवाओं ने ऐसा ही करके दिखाया है।

प्राकृतिक सौंदर्य को समेटे और नगदी फसलों के लिए विख्यात उतरकाशी की यमुनाघाटी में एक युवा ने स्थानीय उत्पादों को बाजार में पंहुचाने का नायाब तरीका निकाला है। वह लगभग 550 ऐसे मझौले किसानों से जुड़ा है, जो कम से कम एक और अधिक से अधिक 10 कुंतल अलग-अलग प्रकार की नगदी फसलों का उत्पादन करते हैं। वे किसान अलग-अलग मौसम में उस युवा का इंतजार करते है। ये युवा है नरेश नौटियाल। यमुनाघाटी की नगदी फसलों को बाजार और पहचान दिलाने का श्रेय नरेश को जाता है। नौगांव, पुरोला व मोरी विकास खंडो के काश्तकार हों या वहां के महिला स्वयं सहायता समूह, उन्हें बस नरेश नौटियाल का ही इंतजार रहता है। 

पुरोला के गुंदियाट गांव निवासी उच्च शिक्षित कैलाश नौटियाल कहता है कि जब से वह नरेश से जुड़ा है तब से गांव में ही स्वरोगार पा चुका है। वह गांव में ही लाल चावल एकत्रित करके नरेश को उपलब्ध करवाता है। उनके यहां स्वंय भी लाल धानहोता है। अपने उपयोग के बाद जो बच जाते है, उसे वह नरेश को बेच देते है। किम्मी गांव के हरिमोहन का कहना है कि नरेश उन्हें उनके उत्पादो का दाम हर सीजन में उनके घर पंहुचा देता है। इसी गांव की कामनी राणा व सुनिता राणा का कहना है कि जब से उनके स्थानीय उत्पाद बाजार में पंहुंचने लगे तब से किसानी करने के तरीकों में भी आमूलचूल परिवर्तन आया है। स्थानीय उत्पादों को बाजार में पंहुचाने का श्रेय भी वे नरेश नौटियाल को ही देते है। वे आगे कहती है कि इधर स्थानीय उत्पादो ने नगदी फसल का रूप लिया और उधर महिलाओं की आर्थिक स्थिति में भी काफी सुधार आने लग गया है। 

यमुनाघाटी के ही नैणी गांव के भगवान सिंह व पीसाऊ गांव के चैन सिंह का कहना है यदि नरेश उनके उत्पादों को नहीं खरीदता तो वे उक्त फसल का उत्पादन ही बंद कर देते। कहते हैं कि उनके क्षेत्र में तो लोगों ने मंडुवा का उत्पादन लगभग बंद ही कर दिया था। पर अब पिछले 10 वर्षो से मंडुवा के उत्पादन करने में लोगों की दिलचस्पी इसलिए बढ़ी है कि उनके हाथों में नगदी आ रही है। वे किसान इस बात का प्रमाण दे रहे हैं कि जिस भी फसल का वे उत्पादन करते हैं वह सभी विशुद्ध रूप से जैविक हैं, क्योंकि वे अपने खेतो में पालतु पशुओं व भेड़-बकरियों का गोबर डालते है। उनका मानना है कि रासायनिक खाद से एक बार फसल का उत्पादन खूब बढ जाता है, मगर वह खेत आने वाले समय के लिए बंजर ही हो जाता है। ऐसे उनके क्षेत्र में कई उदाहरण है।

नरेश अब सीमांत और मझौले किसानो का दुलारा बन गया। यहां के किसान 15 प्रकार की राजमा उगाते हैं। इसके अलावा 60 प्रकार की मोटी दालें हैं। खास बात यह है कि ये सभी विशुद्ध रूप से जैविक खेती की पैदावार हैं। इसके अलावा नरेश स्थानीय किसानों की मदद से अखरोट, जख्या, साबुत मसाले, साबुत हल्दी दाल से बनी हुई बड़ियां, दाल की नाल बड़ी, सिलबटे का पीसा हुआ नमक जैसे 150 प्रकार के स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध करवाता है। प्रत्यक्ष रूप से 1000 युवाओं को नरेश के कारण स्वरोजगार मिला हुआ है।

अकेले नरेश के इस स्वरोजगार के कारण अप्रत्यक्ष रूप से दस हजार की जनसंख्या लाभाविन्त हो रही है। अर्थात 550 परिवारों को स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार से जोड़ा गया है। नरेश के मुताबिक, यमुनाघाटी में पलायन की कोई समस्या नहीं है पर राज्य में जिन जगहों पर पलायन ने विकराल रूप ले लिया है, वहां स्थानीय उत्पादोंका बाजार खड़ा किया जा सकता है।

यमुनाघाटी स्थित देवसारी गांव में जन्में नरेश नौटियाल स्थानीय स्तर पर हार्क नाम की संस्था से जुड़े। जिसके एक्सपोजर ने नरेश को हिम्मत दी और उनमें ये बात घर कर गई कि स्वरोजगार से स्थितियां सुधारी जा सकती है। आखिर वही हुआ और पिछल 10 वर्षो में नरेश ने यमुनाघाटी और गंगा घाटी के स्थानीय उत्पादों को बाजार में उतारने के व्यवसाय में महारथ हासिल कर ली है।

देशभर में लगने वाली प्रदर्शनियों में नरेश के पहाड़ी उत्पाद अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। दिल्ली में हर वर्ष व्यापार मेले में नरेश का पहाड़ी उत्पादों का स्टाल लगता है। अर्थात संसाधनों के अभाव में भी नरेश का खुद का टर्नओवर लगभग 10 लाख रूपयेपहुंच गया है।

नरेश अपने छोटे प्रयास से खुश हैं, वह कहते हैं कि अगर लोग पहाड़ छोड़कर इसे स्वरोजगार से जोड़ें तो पलायन का हल तलाश सकते हैं।

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