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आखिर क्या है केदारनाथ में डार्क टूरिज्म की योजना?

केदारघाटी की प्रलयंकारी आपदा की यादों को टूरिज्म के साथ जोड़ने की योजना पर विचार कर रही है उत्तराखंड सरकार। अमेरिका के ग्राउंड जीरो, फ्रांस की फ्लेम ऑफ लिबर्टी की तर्ज पर विकसित करने की योजना।

 

वर्षा सिंह, देहरादून

 

वर्ष 2013 में केदारनाथ में आई भीषण आपदा ने दुनियाभर का ध्यान अपनी ओर खींचा था। हिमालयी क्षेत्र में आई आपदा में हजारों लोगों की मौत हुई। आधिकारिक आंकड़ा पांच हजार बताया गया। कितने ही लोग ऐसे रहे जिनका आज तक कोई पता नहीं चल पाया। आपदा की तस्वीरें आज भी सिहरन पैदा कर देती हैं। लेकिन आपदा के बाद केदारनाथ फिर गुलजार है। केदारनाथ आने वाले यात्रियों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है।श्रद्धालुओं की संख्या में रिकॉर्ड तोड़ इजाफा हुआ। आस्था की ये यात्रा, उच्च हिमालयी क्षेत्र में रोमांच की यात्रा भी है। अब इसमें डार्क टूरिज्म की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।

 

दरअसल, केदारनाथ के रास्ते पर अब भी आपदा के अवशेष मौजूद हैं। पहाड़ियों से टूटकर गिरे पत्थर उस रात की भयावहता को बताते हैं। अब भी वहां मारे गए लोगों के कंकाल देखने को मिल जाते हैं। आपदा के बाद मंदिर के आगे की दिव्य शिला लोगों का ध्यान खींचती है, जिसने प्रलय के रूप में बहते पानी से मंदिर की रक्षा की थी। इस विशालकाय शिला के मंदिर के पीछे की दीवार पर आ जाने से पानी का बहाव दूसरी ओर मुड़ गया और मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचा। अब यह दिव्य शिला है। आपदा की इन्हीं यादों के साथ टूरिज्म को जोड़ने की योजना पर उत्तराखंड सरकार विचार कर रही है।

 

राज्य के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का कहना है कि न्यू यॉर्क में ग्राउंड ज़ीरो जैसे उदाहरण हैं, जहां त्रासदी में मारे गए लोगों की यादों को सहेजने का कार्य किया गया। पर्यटन मंत्री ने केदारनाथ के बारे में अपनी योजनाओं पर अपने कॉनसेप्ट के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि सरकार की इच्छा है कि यहां आने वाला तीर्थ यात्री 2013 की आपदा में मारे गए तीर्थ यात्रियों को जरूर याद करे। इसी सोच के तहत उन्होंने डार्क टूरिज्म की कल्पना की। इसके साथ ही सरकार केदारनाथ में स्मृति वन भी बनाएगी। जहां लोग मृतकों को याद करेंगे और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर सकेंगे।                         

 

विश्व प्रसिद्ध डार्क टूरिज्म डेस्टिनेशन

 

डार्क टूरिज्म यानी वो जगह किसी आपदा या ऐसी घटना से जुड़ी हों, जो उदास करती हो। जिससे मृत्यु या दर्द की कहानियां जुड़ी हों। इसे ब्लैक टूरिज्म भी कहा जाता है। ऐसी घटनाओं के चलते जिन जगहों की अलग पहचान हो। जो उस हादसे या घटना की याद दिलाते हों और उसे देखने के लिए दुनियाभर के पर्यटक पहुंचते हों।

 

ग्राउंड जीरो, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, न्यूयॉर्क

 

अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हवाई हमले के बाद इसे ग्राउंड ज़ीरो का नाम दिया गया था। उस आतंकी हमले में करीब 3 हजार लोगों की मौत हुई थी। इस घटना को मौजूदा समय का आधुनिक हमला करार दिया जाता है। इस घटना ने दुनियाभर का ध्यान अपनी तरफ खींचा था। अब इस जगह को देखने के लिए हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। एक अनुमान के मुताबिक करीब चार से पांच लाख पर्यटक प्रति वर्ष ग्राउंड जीरो को देखने जाते हैं।

 

फ्लेम ऑफ लिबर्टी, अल्मा ब्रिज टनल, पेरिस

 

इसी तरह फ्रांस के पेरिस में अल्मा ब्रिज टनल जहां 31 अगस्त 1997 को प्रिंसेस डायना की हत्या हुई थी। उस टनल के उपर स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी की तर्ज पर फ्लेम ऑफ लिबर्टी बनाई गई है। इसे प्रिंसेस डायना की स्मृतियों को संजोने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसे देखने के लिए भी पर्यटकों में बड़ी जिज्ञासा रहती है।

 

 

ये भी हैं डार्क टूरिज्म डेस्टीनेशन

 

थाईलैंड की क्वाई नदी पर बना पुल भी डार्क टूरिज्म के लिए मशहूर डेस्टिनेशन में से एक है। ये द्वितीय विश्वयुद्ध की निशानियों में से एक है। इसी तरह अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को का अलकतरा द्वीप, जो खतरनाक अमेरिकी गैंगस्टर्स की जेल हुआ करती थी। अमेरिका के हवाई का पर्ल हार्बर। इटली का पॉम्पैली, जर्मनी में बर्लिन की दीवार, जापान का हिरोशिमा शहर जो परमाणु हमले में तबाह हुआ था। इन जगहों से जुड़ी भयावह दास्तानों के चलते ये डार्क टूरिज्म के रूप में विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हैं।

 

देश के प्रसिद्ध डार्क टूरिज्म स्थल

 

हमारे देश में भी ऐसे कई पर्यटन स्थल हैं जो बीते दौर के त्रासद किस्सों की वजह से जाने जाते हैं। जहां इंसानों की मुश्किलों परिस्थितियों से जूझने की निशानियां मौजूद हैं। एडवेंचर टूरिज्म की तर्ज पर डार्क टूरिज्म को लेकर भी युवाओं में उत्साह बढ़ रहा है। हमारे देश में तो ऐसी कई जगहें हैं।

 

जलियांवाला बाग, अमृतसर

 

 

देश की आजादी के जंग के दौरान अमृतसर का जलियांवाला बाग। जहां 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे लोगों, महिलाओं और बच्चों पर गोलियां बरसाईं गईं थीं। उन जगहों पर गोलियों के दागने से हुए छेद और वो कुआं, गोलियों से बचने के लिए जिसमें लोगों ने छलांगें लगा दी थीं।

 

सेल्यूलर जेल, अंडमान निकोबार

 

 

इसी तरह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की सेल्युलर जेल जिसे काला पानी भी की सजा भी कहा जाता है। जिसे अंग्रेज राजनीतिक कैदियों के लिए खासतौर पर इस्तेमाल किया करते थे।

 

 

रूपकुंड, उत्तराखंड

 

उत्तराखंड का रुपकुंड झील भी कंकाल झील के रूप में एक जमाने में मशहूर हुआ करती थी। समुद्र तल से करीब 16500 फीट की ऊंचाई पर बनी झील में वर्ष 1942 में बड़ी संख्या में मानव कंकाल तैरते पाये गए। कहा जाता है कि उस समय जबरदस्त गर्मी के चलते झील और उसके आसपास की बर्फ़ पिघल गई थी। शुरुआत में माना गया कि वो जापानी सैनिकों की अस्थियां रही होंगी जो विश्व युद्ध के दौरान मारे गए थे। लेकिन बाद में ये थ्योरी गलत साबित हुई और वर्ष 2004 में पता चला कि ये 850 ईसा पूर्व की मानव अस्थियां हैं। हालांकि उसके बाद कंकालों को लेकर और भी अलग-अलग तरह की बातें कहीं गईं। ये गुत्थी अब भी अनसुलझी है।

 

गांधी स्मृति, नई दिल्ली

 

इसके अलावा गुजरात का भुज क्षेत्र जहां वर्ष 2001 के भूकंप ने तबाही मचाई थी। जिसमें हजारों लोगों की जान गई थी। लोगों के अंदर उस क्षेत्र को देखने की जिज्ञासा है, जिसने वो भूकंप झेला था और लोग इस वजह से भुज देखने जाते हैं।इसी तरह दिल्ली में गांधी स्मृति, जहां महात्मा गांधी पर नाथू राम गोडसे ने गोलियां बरसाईं थीं और बापू ने अपने प्राण त्यागे थे।

 

केदारनाथ में लापता लोगों का रहस्य

 

इसी तरह केदारनाथ के रास्ते में भी नर कंकाल दिख जाते हैं। पिछले वर्ष दो दिन के भीतर कई नर कंकाल मिले थे। पिछले वर्ष अक्टूबर में हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस टीम ने केदारनाथ में लापता शवों की तलाश में अभियान चलाया। सर्च ऑपेशन में लगी टीम को लिंचोली और गौरीकुंड से लेकर रामबाड़ा के बीच 18 नर कंकाल मिले। इसके अलावा रामबाड़ा और त्रियुगीनारायण के उस रूट पर कंकाल मिले, जहां पहले कई सर्च ऑपरेशन चलाए जा चुके थे। सरकार ने हाईकोर्ट में दिए शपथ पत्र में केदारनाथ आपदा में 3322 लोगों के लापता होने की बात कही थी। इस दौरान चलाए गए सर्च ऑपरेशन से 678 शव बरामद किए गए। जबकि 2014 से 2017 तक चलाए गए अभियान के दौरान कई और नर कंकाल बरामद किए गए।

 

केदारनाथ आपदा में लापता लोगों की तलाश को लेकर सरकार क्या कुछ कर रही है। इस पर अप्रैल 2019 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से पूछा कि वर्ष 2013 में हुए केदारनाथ आपदा के दौरान लापता हुए लोगों को खोजने के लिए क्या क़दम उठाए गए। याचिका में कहा गया है कि इस आपदा के छह साल गुज़र जाने के बाद भी लापता लोगों के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि केदारनाथ घाटी में आई आपदा में करीब 4200 लोग लापता हुए थे, जिसमें 600 से कुछ अधिक लोगों के कंकाल बरामद हुए। हालांकि सरकार के आंकड़ों में अंतर है।

 

लेकिन वे लोग अब केदारघाटी के रहस्य बन गए हैं। यहां आने वाले तीर्थ यात्रियों के जेहन में आपदा की बातें और स्मृतियां कौंधती हैं। इसीलिए राज्य सरकार अब इसे डार्क पर्यटन का रूप देने की कोशिश कर रही है। पर्यटन मंत्री के मुताबिक इस संबंध में केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाएगा।

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