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“शिक्षक” को देश की शिक्षा का जिम्मा

पीएम मोदी ने फिर दिखाया पहाड़ से प्यार

 

वाई एस बिष्ट, दिल्ली

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराखंड के लगाव किसी से छिपा नहीं है। उत्तराखंड के कई बेटे उनके शासन-प्रशासन और रक्षा-सुरक्षा की कोर टीम का हिस्सा हैं। अब पीएम मोदी ने अपनी दूसरी पारी में पहाड़ के बेटे को देश की शिक्षा का दायित्व सौंपा है। हरिद्वार से सांसद डा. रमेश पोखरियाल निशंक को मोदी कैबिनेट में मानव संसाधन विकास मंत्रालय जैसा महत्वूपर्ण विभाग सौंपा गया है। पूरे देश के शिक्षा जगत से जुड़ा यह विभाग सरकार के अति महत्वपूर्ण विभागों में से एक है।

 

उत्तराखंड के पूर्व सीएम रहे निशंक के सामने जहां प्रधानमंत्री मोदी के भरोसे पर खरा उतरने की चुनौती है, वहीं राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर आगे बढ़ने का एक सुनहरा अवसर भी है। साल 2011 में निशंक को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया था, महज डेढ़ साल के कार्यकाल के बाद विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें हटाकर मेजर जनरल (रिटा.) बीसी खंडूड़ी को फिर से प्रदेश की बागडोर सौंप दी गई थी। वह निशंक के राजनीतिक कैरियर का सबसे बुरा दौर था। हालांकि तमाम उतार चढ़ाव के बावजूद उन्होंने धीरज बनाए रखा। पार्टी ने निशंक पर विश्वास जताया और साल 2014 में हरिद्वार सीट से लोकसभा चुनाव में मैदान में उतारा। निशंक सांसद बने लेकिन उनकी जगह राजनीति में काफी जूनियर माने जाने वाले अजय टम्टा को मंत्रिमंडल में लिया गया। अब पीएम मोदी ने निशंक को कैबिनेट में लाकर उन्हें केंद्रीय राजनीति में बड़ा अवसर दिया है। भाजपा की मुख्यधारा में वापस जगह दी है। वहीं मानव संसाधन विकास जैसा मंत्रालय देकर काम करने का बड़ा अवसर भी दिया है। भाजपा के दूसरी पीढ़ी के नेताओं में शामिल निशंक के सामने पीएम को भरोसे पर खरा उतरने की चुनौती है।

 

निशंक आज तमाम विवादों से आगे निकलकर अपनी नई ज़िम्मेदारी के प्रति सजग हैं। उनका साफ़ कहना है कि पीएम मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उनपर जो भरोसा जताया है, उसपर पूरी तरह से खरा उतरेंगे।

 

निशंक ने बड़ा दायित्व मिलने पर कहा कि मानव संसाधन बड़ा मंत्रालय है और देश के युवाओं के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। मेरे लिए जहां चुनौती है, काम करने का भी अवसर है। मैंने हमेशा काम किया है और मैं उस पर खरा उतरूंगा। भारत की शिक्षा विश्व गुरु वाली रही है, उसे बाहर ले जाना मेरी कोशिश होगी।

 

एनएसए डोभाल से भी मिलने पहुंचे

निशंक ने केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से भी मुलाक़ात की। इस मुलाकात का मक़सद अपनी नई भारी भरकम ज़िम्मेदारी से पहले सबका मार्गदर्शन लेना था।

 

साल 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रमेश पोखरियाल निशंक से कहा कि अब तुम्हें राजनीति में आना है। निशंक इसके लिए तैयार नहीं थे उन्होंने इनकार कर दिया। उसके कुछ दिनों बाद निशंक पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से मिले। शंकर दयाल शर्मा ने पूछा कि आज तुम्हारे चेहरे पर परेशानी क्यों है इस पर निशंक ने कहा कि अटल बिहारी जी मुझे चुनाव लड़ने के लिए कह रहे हैं। लेकिन मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता। यह सुनकर शंकर दयाल शर्मा नाराज़ हो गए। उन्होंने कहा कि तुम किस बात के निशंक हो? अगर राजनीति में आने से डर रहे हो। ‘निशंक’का अर्थ होता है जिसे किसी का डर न हो।

 

इस बात ने निशंक का जीवन इस बात बदल दिया। वे तुरंत वाजपेयी से मिलने पहुंचे। कहा, मैं चुनाव लड़ने के लिए तैयार हूं। वाजपेयी ने पूछा कहां से चुनाव लड़ोगे। इस पर निशंक ने कहा कि आप जहां से बोलेंगे मैं वहां चुनाव लड़ूंगा। वाजपेयी ने कहा कि तुम कर्णप्रयाग से चुनाव लड़ो। उसके बाद साल 1991 में निशंक पहली बार उत्तर प्रदेश में कर्णप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए और लगातार तीन बार वर्ष 1993 एवं 96 में विधायक रहे। वर्ष 1997 में उत्तर प्रदेश सरकार में कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में पर्वतीय विकास विभाग के कैबिनेट मंत्री और उसके बाद 1999 में रामप्रकाश गुप्त की सरकार में संस्कृति मंत्री रहे।

 

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद वर्ष 2000 में वह प्रदेश के पहले वित्त पेयजल सहित 12 विभागों के मंत्री बने।वर्ष 2007 में उत्तराखंड सरकार में चिकित्सा और विज्ञान प्रौद्योगिकी विभाग के मंत्री रहे। वर्ष 2009 में उत्तराखंड प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2011 में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त हुए और वर्ष 2012 में ही डोईवाला क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए।वर्ष 2014 में डोईवाला से इस्तीफा देकर हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए और वर्ष 2014 से 2019 तक लोकसभा की सरकारी आश्वासन समिति के सभापति रहे।

 

शिशु मंदिर से शिक्षा मंत्री तक

 

निशंक एक बहुत गरीब परिवार से यहां तक पहुंचे हैं। उनके पिताजी उद्यान विभाग में माली थे। शिशु मंदिर में पढ़ाई की और फिर 1982 में उत्तरकाशी स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षक की नौकरी की। 1991 में पहली बार विधायक बने। निशंक की बड़ी बेटी सेना में मेडिकल ब्रांच में सेवारत है। दूसरी बेटी कानून की पढ़ाई करने के बाद काम कर रही हैं। जीवन में कई उतार-चढ़ाव उनके सामने आए। मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी, उसके बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी, उन्हें मालूम था कि उनके कुछ फैसलों की आलोचना हो सकती है लेकिन उन्होंने कभी भी गलत मंशा से कोई काम नहीं किया। वह कहते हैं कि मैंने जो भी फैसले लिए वह लोगों के हित में लिए।

 

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