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महिला सशक्तिकरण का नया चेहरा, ‘सरैंया बैंड’

सरैयां महिला बैंड ने जातिवाद और लैंगिक भेदभाव की दीवार, दोनों को तोड़ने की कोशिश की है। पहले महिला सरैयां को वर्ष 2017 में लॉन्च किया गया। फिर इसे बैंड के रूप में सामने लाने का विचार आया। जिसमें लड़कियां ढोल-दमाऊं, नगाड़े, मसकबीन बजाती हैं।

– वर्षा सिंह

तलवार और ढाल पकड़े दो लड़कियां युद्ध कला का कौशल दिखा रही हैं। एक ने हवा में तलवार भांजी तो दूसरी ने ढाल से बचाव किया और फिर अपनी तलवार से ललकारा। पृष्ठभूमि में ढोल-दमाऊ और मसकबीन गूंज रही है। तीन छोटी बच्चियां इन वाद्ययंत्रों से तलवारबाजी के युद्ध की तीव्रता को और बढ़ा देती हैं। दर्शक महिला सरैयां को कुछ कौतुहल के साथ देख रहे हैं और फिर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ वीर रस का ये नृत्य समाप्त होता है।

पहाड़ों के बीच इस तरह की युद्ध-कला का प्रदर्शन बहुत पहले हुआ करता था। नई बात ये है कि अब ये जौहर लड़कियां दिखा रही हैं। गढ़वाल में लड़कियों का ये पहला म्यूज़िकल बैंड हैं। सरैयां नृत्य के नाम पर इस बैंड का नाम ‘सरैयां बैंड’ रखा गया है।

ये बैंड पौड़ी के सुधीर सुंद्रियाल की कल्पना का ख़बूसूरत नतीजा है। सुधीर बताते हैं कि सरैयां नृत्य शादी-ब्याह में किया जाता था। जिसमें पुरुष ही हिस्सा लेते थे। उनकी एक ख़ास किस्म की वर्दी होती है। ये वीर रस का नृत्य है। हाथ में ढाल-तलवार लेकर युद्ध कला दिखाने वालों को सरैयां कहते हैं। सुधीर कहते हैं कि वक्त के साथ धीरे-धीरे ये परंपरा खत्म हो रही है। तो महिला सरैयां बैंड के माध्यम से इस परंपरा को जगाए रखने और महिला सशक्तीकरण का विचार आया।

इस बैंड को बनाने में एक मुश्किल ये भी थी कि सरैयां पहले दलित समुदाय के लोग ही हुआ करते थे। सुधीर बताते हैं कि गांव के लोगों को पहले तो लड़कियों के लिए इस विचार को लेकर आपत्ति थी। फिर जाति को लेकर भी आपत्ति जताई गई कि जो कार्य दलित समुदाय किया करता था, उसके लिए हमारी बेटियों को क्यों बढ़ावा दे रहे हैं। उनका कहना है कि सरैयां महिला बैंड ने जातिवाद और लैंगिक भेदभाव की दीवार, दोनों को तोड़ने की कोशिश की है। महिला सरैयां को वर्ष 2017 में लॉन्च किया था। फिर इसे बैंड के रूप में सामने लाने का विचार आया। जिसमें लड़कियां ढोल-दमाऊं, नगाड़े, मसकबीन सब बजाती हैं। फिलहाल इस सरैयां बैंड में पांच लड़कियां हैं। जिनमें से दो सरैयां हैं और तीन लड़कियां बैंड में हैं। वे परंपरागत वाद्ययंत्रों को बजाती हैं।

सरैयां बैंड में युद्ध कला का कौशल दिखाने वाली नेहा बुडाकोडी चरगाड गांव की हैं। उनकी दूसरी साथी अमीषा भी इसी गांव की हैं। नेहा बीएससी की छात्रा हैं। सरैयां के बारे में बात करते हुए उनकी आवाज़ खनकती है। नेहा कहती हैं कि हमने कभी कोई महिला सरैयां देखी ही नहीं, न कभी इसके बारे में सोचा। सुधीर सुंद्रियाल को वह मामा कहती हैं। नेहा के मुताबिक मामा जी ने उनका हौसला बढ़ाया। फिर कुछ झिझक के साथ उन्होंने इसके लिए हामी भर दी। वो कहती है कि आपको पीछे ढकेलने वाले बहुत लोग होते हैं लेकिन यहां एक नये रास्ते पर आगे बढ़ने का मौका था। उन्होंने थोड़ी हिम्मत जुटायी और बैंड की तैयारी शुरू कर दी। नेहा बताती हैं कि सरैयां बनने से पहले उन्होंने इसके बारे में जानकारी जुटायी। घर के बुजुर्गों से बात की।

वो कहती है कि हमारा गढ़वाल 52 गढ़ का देश कहा जाता है। पुराने समय में जब लड़ाइयां छिड़ती थीं, तो वीरों का उत्साह वर्धन करने के लिए सरैयां जाते थे। फिर धीरे धीरे ये परंपरा मनोरंजन के रूप में सामने आई। फिर पता चला कि कभी कोई लड़की सरैयां नहीं बनी। लेकिन जब उन्होंने अपने बैंड के साथ परफॉरमेंस दी, तो बहुत अच्छा लगा। नेहा कहती है कि बैंड के लिए गांव की दूसीर लड़कियों से भी बात की गई। कुछ लड़कियों ने मना कर दिया और कुछ लड़कियों के परिवार वालों ने। नेहा इस बात को बार-बार कहती है कि यहां नेगेटिविटी बहुत ज्यादा है। लोग लड़कियों को आगे बढ़ने के लिए सपोर्ट नहीं करते। कई बार परिवार भी पीछे ढकेलता है। लेकिन उन्हें इस काम में बहुत मजा आ रहा है।

पोखड़ा, गंवाणी, देवड़ाखाल, रिंगवाड़ी के ग्राम महोत्सव में सरैयां बैंड ने अपनी परफॉर्मेंस दे चुकी है। और भी कई जगहों से बुलावा आ रहा है। सुधीर सुंद्रियाल बताते हैं कि जयपुर से इन लड़कियों को सम्मानित करने के लिए बुलाया गया था। लेकिन तब बैंड की एक सदस्य अमीषा बारहवीं का इम्तिहान दे रही थी। इसलिए मना कर दिया।

चरगाड गांव की ही अमीषा कहती है कि जब वे सरैयां बैंड में परफॉर्म करती हैं तो कुछ लोग बहुत तारीफ करते हैं, कुछ बुरा भी मानते हैं कि ये काम लड़कियों को नहीं करना चाहिए। वो कहती हैं कि मैं किसी को जवाब नहीं देती, मुझे जो करना है चुपचाप करती हूं। अमीषा दृढ़ निश्चय के साथ कहती हैं कि मैं इस बैंड में हर हाल में बनी रहूंगी। जो लोग ऐसा बोलते हैं, गलत बोलते हैं। फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलॉजी के सूत्र समझने वाली अमीषा को तलवार और संगीत का ये संगम खूब भा रहा है।

बैंड की तीन अन्य लड़कियां गवाणी गांव की हैं। महिला सरैयां बैंड को और सशक्त बनाने और स्थायित्व देने के लिए कोशिश की जा रही है कि पहाड़ की बहुओं को इसमें जोड़ा जाए। सुधीर कहते हैं कि बेटियां साल-दो साल बाद ब्याह कर चली जाती हैं। इसलिए छोटी उम्र की लड़कियों और गांव की बहुओं को मनाने की कोशिश की जा रही है। इससे लोगों के नज़रिये में भी बदलाव आएगा। सुधीर कहते हैं कि महिला सरैयां बैंड की लड़कियों के व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव आये हैं। वे बैंड के साथ अपनी पढ़ाई-लिखाई में भी बहुत अच्छा कर रही हैं।

ये उत्तराखंड में पहला महिला सरैयां है। स्थानीय स्तर पर भले ही कुछ लोगों ने आलोचना की। जाति को लेकर नाराजगी जताई गई। लेकिन इसका बहुत अच्छा रिस्पॉन्स भी देखने को मिल रहा है। दून यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर की बेटी महिला सरैयां पर रिसर्च कर रही हैं।

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