शराब के खिलाफ फिर सड़कों पर मातृशक्ति

sharabKi-dukaanउत्तराखंड में जब भी मातृशक्ति सड़कों पर उतरी है, उसका कुछ न कुछ सकारात्मक परिणाम निकला है, बेशक परिणाम आने में देर लगी हो, लेकिन सत्ता को झुकना पड़ा है। चाहे चिपको आंदोलन रहा हो या फिर उत्तराखंड को शराब मुक्त करने का अभियान या फिर अलग राज्य आंदोलन, मातृशक्ति ने सड़कों पर उतरकर न सिर्फ प्रचंड आंदोलन चलाया, बल्कि उस आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने में सफलता भी हासिल की। आज एक बार फिर मातृशक्ति सड़कों पर है और मामला एक बार फिर शराब विरोध का है। राज्य के लगभग सभी जिलों में महिलाएं अप्रैल के महीने से शराब के ठेकों का विरोध कर रही हैं। कई जगहों पर प्रशासन ने मातृशक्ति के सामने घुटने टेककर शराब का ठेका यह तो वहां से हटाकर दूसरी जगह खुलवा दिया है या फिर पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। लेकिन, महिलाएं इससे संतुष्ट नहीं हैं, वे तो पूरे राज्य को शराब मुक्त करने के अभियान पर हैं। राजनीतिक सत्ता और विपक्षी से इस आंदोलन को कोई सहयोग मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि बारी-बारी से सत्ता में रही भाजपा और कांग्रेस के कई कद्दावर नेताओं के तार शराब कारोबारियों से जुड़े रहे हैं और वे राज्य की आर्थिक स्थिति के बहाने शराब का कारोबार किसी भी हालत में बंद करने के पक्ष में नहीं हैं। इतना ही नहीं राज्य में पुरुषों का भी एक बड़ा वर्ग महिलाओं के इस आंदोलन के विरोध में है, बावजूद इसके इस मामले में लगातार संघर्ष कर रही है। उम्मीद की जा सकती है भविष्य में यह आंदोलन अवश्य मुकाम तक पहुंचेगा।

इस बार आंदोलन का दूसरा रूप दिखा

आमतौर पर मार्च महीने के आखिरी और अप्रैल की शुरुआती दिनों में राज्य में कई जगहों पर शराब विरोधी आंदोलन होते हैं, लेकिन ये आंदोलन आमतौर पर प्रायोजित होते हैं और इसका मुख्य मकसद क्षेत्र के शराब ठेकेदारों से मोटी रकम वसूलना होता है। कुछ लोग भोले-भाले ग्रामीणों को फुसलाकर आंदोलन शुरू करवा देते हैं और जब आंदोलन के कारण शराब ठेकेदार को अपने कारोबार पर खतरा दिखने लगता है तो ये लोग ठेकेदारों से मोटा पैसा लेकर न सिर्फ खुद आंदोलन से अलग हो जाते हैं, बल्कि आंदोलन की बागडोर संभाल रहे लोगों को किसी न किसी तरह से लालच देकर या फिर तरह-तरह के डर दिखाकर आंदोलन से अलग कर देते हैं। इस तरह अप्रैल के पहले या दूसरे सप्ताह में ही शराब विरोधी आंदोलन अपनी मौत मर जाता है और इसके पीछे काम करने वाले शातिरों को इतनी रकम मिल जाती है कि उन्हें फिर पूरे साल कोई काम करने की जरूरत नहीं होती।

लेकिन, इस बार का आंदोलन कुछ अलग तरह का रहा। मातृशक्ति ने इस बार ठेकेदारों से पैसे वसूलकर आंदोलन को खत्म करने वाले शाजिशबाजों की बातों पर ध्यान नहीं दिया। कई जगहों पर सत्ता को उनके आंदोलन के सामने झुकना पड़ा और कई जगहों पर महिलाओं का आंदोलन अब भी चल रहा है। कहना न होगा कि राज्य सरकार ने इस बार शराब से राजस्व वसूली है जो लक्ष्य निर्धारित किया है, उसे प्राप्त करना असंभव होगा।

क्या है सरकार का लक्ष्य

Sharab bandi Andolanराज्य सरकार ने पिछले वित्त वर्ष से शराब से 21 हजार करोड़ रुपये की वसूली का लक्ष्य रखा था, लेकिन सरकार 19 हजार करोड़ रुपये ही वसूल कर पाई थी। इस बार भाजपा सरकार से पहले से अधिक पैसे कमाने का इरादा जताया है और शराब से 23 हजार करोड़ रुपये वसूली का लक्ष्य रखा है। इतना ही नहीं इस बार राज्य सरकार ने शराब के ठेकों के लिए आवेदन करने वालों से भी ज्यादा से ज्यादा धनराशि वसूल करने का मन बनाया था और अंग्रेजी शराब की ठेकों का आवेदन शुल्क 20 हजार रुपये से बढ़ाकर 22 हजार रुपये कर दी थी। इसी तरह देशी शराब के ठेकों के आवेदन शुल्क में दो हजार रुपये की बढ़ोत्तरी कर दी गई थी, लेकिन इस पहले ही मोर्चे पर सरकार पूरी तरह से फेल हो गई और और पिछले साल जहां 7500 आवेदन आये थे, वहीं इस बार करीब 3600 आवेदन ही मिले, यानी पिछले साल आवेदनों से हुई कमाई करीब आधी हो गई।

शराब से सबसे ज्यादा कमाई की उम्मीद

राज्य सरकार के इस बार की शराब नीति पर नजर दौड़ायें तो साफ हो जाता है कि राज्य सरकार शराब को दुधारू गाय मानकर चल रही है। इस बार न सिर्फ शराब के दाम 15 प्रतिशत बढ़ा दिये गये हैं, बल्कि अलग से दो प्रतिशत सेस भी लगा दिया गया है। सरकार का अनुमान है कि देशी और विदेशी शराब की बिक्री से सरकार को कुल मिलाकर 46 हजार करोड़ रुपये ही आमदनी हो जाएगी। इसके लिए बाकायदा सभी जिलाधिकारियों के लिए शराब बेचने का लक्ष्य भी तय कर दिया गया है। यानी कि जिलाधिकारी अब अन्य कार्यों के साथ अपने-अपने जिलों में शराब की खपत बढ़ाने की दिशा में भी काम करेंगे।

राज्यमार्ग बना दिये जिला मार्ग

sharab_virodhउत्तराखंड की सरकार शराब बेचने के लिए कितनी उत्सुक है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शराब की बिक्री में किसी तरह की कोई कमी न आए इसके लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी तोड़ निकाल दिया। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम आदेश में राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में कोई भी शराब का ठेका न खोलने के आदेश दिये थे। इससे राज्य के लगभग 40 फीसदी ठेके प्रभावित होने जा रहे थे, लेकिन राज्य सरकार ने इसका तोड़ यह निकाला कि कई राज्य मार्गों को जिला मार्ग घोषित कर दिया और इस सड़कों को ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के दायरे से बाहर कर दिया।

हालांकि विधानसभा में आबकारी मंत्री प्रकाश पंत ने सरकार के इस फैसले पर लीपापोती करने का भी प्रयास किया। उनका तर्क था कि राज्य मार्गों को म्यूनिसिपल क्षेत्र से गुजरने वाले हिस्से को ही जिला मार्ग घोषित किया गया है। उनका अजीब लगने वाला तर्क यह भी था कि पालिका क्षेत्र में इन राज्य मार्गों के विकास में बाधा पड़ रही थी, इसलिए ऐसा किया गया, न कि शराब की बिक्री बढ़ने के लिए। शराब खपत ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के प्रयास करने के बावजूद राज्य सरकार का तर्क है कि वह राज्य में शराब को हतोत्साहित करने का प्रयास कर रही है।

पर मातृशक्ति पर नहीं जोर

प्रदेश सरकार कभी राज्य की कमजोर आर्थिक स्थिति और कभी पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर शराब का कारोबार जारी रखने के तर्क दे रही है, लेकिन मातृशक्ति इन कुतर्कों में नहीं आ रही है, यही वजह है कि कुछ स्थानों पर सत्ता शासन ने शराब के ठेकों को दूसरी जगह पर स्थानान्तरित कर दिया है, जबकि देहरादून के दो गांवों में महिलाओं के प्रचंड विरोध को देखते हुए स्वयं मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिहं रावत ने नीलामी के बावजूद शराब ठेकों को निरस्त करने की घोषणा भी की और जिन लोगों के नाम ठेका खुला था उनकी जमा की गई धनराशि वापस दिलाने के निर्देश भी दिये। राज्य में कुछ स्थानों पर भारी विरोध के कारण शराब के ठेकों को पिछली जगह से 8-10 किमी दूर स्थानान्तरित कर दिया गया, हालांकि आंदोलन कर रही महिलाएं इससे संतुष्ट नहीं हैं और ठेकों को पूरी तरह से बंद करने की मांग पर अड़ी हुई हैं।

हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची सरकार

राज्य की भाजपा सरकार एक ओर से राज्य में शराब को हतोत्साहित करने के दावे कर रही है, लेकिन दूसरी ओर शराबबंदी को लेकर हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर इस तरह के फैसलों पर रोक भी लगवा रही है। नैनीताल हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य के तीन जिलों रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और चमोली में नये वित्त वर्ष में शराब का कोई ठेका न खोलने के आदेश दिये थे, लेकिन राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले को लागू करके राज्य में शराबबंदी की ओर एक कदम बढ़ाने का प्रयास करने के बजाय हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी, नतीजा यह हुआ कि अब इन तीन जिलों में धड़ल्ले से शराब की दुकाने चल रही हैं।

देवाल में 30 किमी दूर ठेका खोल दिया

sharaw2अप्रैल के पहले सप्ताह ही राज्य के लगभग सभी जिलों में अनेक स्थानों पर महिलाएं शराब ठेकों के विरोध में सड़कों पर उतर आई थी। चमोली जिले के दूर-दराज के देवाल से लेकर राजधानी देहरादून तक में महिलाएं सड़कांे पर उतर आई थीं। हालांकि इन आंदोलन में कई स्थानों पर पुरुषों ने भी भागीदारी निभाई, लेकिन वह नाममात्र ही ही रही। देवाल में आंदोलन अब भी जारी है। यहां महिलाओं के दबाव में शराब की दुकान सील कर दी गई थी, लेकिन महिलाएं इससे संतुष्ट नहीं हुई। वे दुकान में बंद स्टॉक को यहां से पूरी तरह से हटाने की मांग पर अड़ी रही। आखिरकार न सिर्फ शराब के स्टॉक को हटा दिया गया, बल्कि तहसीलदार ने लिखित रूप से यह भी आश्वासन दिया कि अब यहां शराब का ठेका नहीं खोला जाएगा। इसके बाद प्रशासन ने एक नया रास्ता निकाला और देवाल से करीब 10 किमी दूर पूर्णा नामक स्थान पर शराब का ठेका खोल दिया। आसपास के गांवों की महिलाएं फिर इकट्ठा हो गई और पिछले दो महीने से लगातार आंदोलन कर रही हैं।

चमोली में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां

चमोली में नेशनल हाईवे के 500 मीटर के दायरे में शराब का ठेका न खोलने के आदेश की शातिराना तरीके से धज्जियां उड़ाई गई हैं। यहां शराब का ठेका नेशनल हाईवे से सिर्फ 10 मीटर नीचे उतरकर खोल दिया गया है। गाड़ी सड़क पर खड़ी करके 5 मिनट में ही शराब खरीदकर वापस लौटा जा सकता है, लेकिन यहां चालाकी यह की गई कि जिस जगह शराब की दुकान है उसकी दूरी नेशनल हाईवे पर उस जगह से दर्शाई गई है, जहां से सड़क कटती है और शराब वाली जगह पर पहुंचती है। यह दूरी करीब एक किमी है। कई अन्य जगहों पर भी इस तरह के हथकंडे अपनाये गए हैं।

कई जगह ठेकों में आग

महिलाओं में शराब की बोतलें तोड़ने और ठेकों में आग लगाने जैसे उग्र कदम भी उठाये हैं। चमोली और पिथौरागढ़ में कई स्थानों पर इस तरह की घटनाएं हुई। रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि और चोपता में भी शराब की बोतलें तोड़ी गई। अगस्त्यमुनि में शराब बेचने के लिए बनाये गये अस्थाई टिनशेड को भी महिलाओं ने तोड़ दिया। कर्णप्रयाग में भारी विरोध के बावजूद ठेका खोल दिया गया है। इसी तरह गोचर में भारी विरोध को देखते हुए शराब ठेका मुख्य बाजार के बजाय बाजार से कुछ पहले डाटपुल पर खोल दिया गया है, लेकिन यहां बच्चों का एक शिक्षण संस्थान शराब ठेके से मात्र कुछ मीटर की दूरी पर है। गौचर पाॅलीटेक्निक भी इस स्थान से पैदल मार्ग पर कुछ मीटर ही दूरी पर है। उधर गोपेश्वर में भी शराब का खूब विरोध हुआ, गैरसैंण और मेहलचैंरी में भी अब तक महिलाएं धरना दे रही हैं। रुद्रप्रयाग के ऊखीमठ, सतेराखाल और बसुकेदार में आंदोलन लगातार चल रहा है, हालांकि इस सभी जगहों पर शराब के ठेके भी चल रहे हैं। श्रीनगर में भी महिलाएं लगातार आंदेालन कर रही हैं।

कुमाऊं में भी छटपटाहट

कुमाऊं क्षेत्र लगभग सभी पर्वतीय जिलों में भी शराब के विरोध में लगातार छटपटाहट है। पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जिलों के कई स्थानों पर तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं हुई हैं, बावजूद इसके हर जगह ठेके खोल जा रहे हैं। हालांकि राज्य सरकार यह कहकर अपनी पीठ खुद थपथपा रही है कि पिछले सरकार में 523 ठेके थे और हमने 503 ही खोले हैं।

धीरे-धीरे शराब बंद करेंगे

राज्य सरकार हर हाल में शराब को हतोत्साहित करना चाहती है, लेकिन एक साथ सभी ठेकों को बंद करना संभव नहीं है। हम धीरे-धीरे दुकानों की संख्या कम करेंगे और कुछ साल बाद राज्य पूरी तरह से शराब बंद हो जाएगी। हां यह अवश्य देखना होगा कि शराबबंदी के कारण पर्यटन व्यवसाय को नुकसान न हो।

प्रकाश पंत, आबकारी मंत्री, उत्तराखण्ड।

क्या कहते हैं लोग

जहां तक आम लोगों का प्रश्न है तो ज्यादातर लोग मानते हैं तो जगह-जगह खुले शराब के ठेके बंद किये जाने चाहिए। यदि सरकार को आशंका है कि इससे पर्यटन व्यवसाय को नुकसान होगा तो इसके लिए राज्यभर में लगभग सभी पर्यटन स्थलों में मौजूद जीएमवीएन और केएमवीएन के गेस्ट हाउस में बार खोले जा सकते हैं। ऐसा करके पर्यटकों के साथ ही अधिक पैसे खर्च करने की सामथ्र्य रखने वाले लोग भी इन बार में जा सकते हैं।

क्या कहती हैं कांग्रेस

कांग्रेस ने भी अपने शासनकाल में इस तरह का कोई कदम नहीं उठाया, बल्कि तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत पर तो शराब नीति की आड़ में एक खास ब्रांड की शराब के अलावा अन्य सभी ब्रांड बंद करके उस खास कंपनी को लाभ पहुंचाने के आरोप भी लगे। उस दौर में सीएम को लोग डेनिस सीएम के नाम से पुकारने लगे थे। अब जबकि पूरे राज्य में महिलाएं शराब के विरोध में सड़कों पर हैं तो कांग्रेस ने एक भी शब्द इस आंदोलन के पक्ष में नहीं कहा, बल्कि इसके उलट कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने शराब महंगी किये जाने के सरकार के फैसले पर सवाल उठाये और कहा कि इससे राज्य में शराब की तस्करी बढ़ेगी।

त्रिलोचन भट्ट

This entry was posted on Friday, July 7th, 2017 at 2:01 pm and is filed under समाचार. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

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