देश के नए सेनापति जनरल बिपिन रावत के अनछुए और अनसुने पहलू

Lt Gen Bipin Rawat, VCOASजनरल बिपिन रावत 31 दिसम्बर को देश के अगले सेना प्रमुख का पद संभालेंगे इसके साथ ही उनके पत्नी मधुलिका रावत भी आर्मी वाइफ वेलफेयर एसोसिएशन यानी आवा का पद संभालेंगी। मनजीत नेगी ने मधुलिका रावत से खास बातचीत की। जनरल बिपिन रावत के पिता स्वर्गीय लेफ्टिनेंट जनरल एल एस रावत सेना में डिप्टी चीफ रहे हैं। जबकि मधुलिका रावत मध्य प्रदेश के शहडोल की रहने वाली हैं। वे समाजसेवा से जुडी हुई हैं। जनरल रावत के सेना में होने के कारण मधुलिका रावत ने ही अपने बच्चों को ज्यादातर समय दिया। उनकी दो बेटियां है।

मधुलिका रावत ने बताया कि उन्हें इस बात का बिल्कुल आभास नही था कि जनरल बिपिन रावत सेना प्रमुख बनने जा रहे हैं। जैसे फोन आने शुरू हुए तो मुझे अहसास हुआ कि ऐसा कुछ है। मेरे बच्चे तो यही कहते हैं जैसे आर्मी में लोग जनरल रावत की तारीफ करते हैं काश ऐसे वे घर पर भी हों। फील्ड एरिया में रहने के कारण मैंने ही बच्चों का ध्यान रखा है। लेकिन वे बच्चों को बहुत प्यार करतें हैं। वो दिखावा नहीं करते।

लिखना पढ़ना ये उनकी हॉबी हैं। वे अपने ही देश में घूमना पसंद करते हैं। एक बार हम विदेश घूमने गए तो सबने कहा कि कितना सुन्दर स्विट्जरलैंड है तो उन्होंने कहा कि अपना कश्मीर भूल गए ये लोग। उनको अपने देश से बहुत प्यार है। सेना की लाइफ को समझने में मेरे कई साल निकल गए। मैं अपने सास ससुर और बच्चों के साथ रही। जब वे आर्मी कमांडर बने तब मैं उनके साथ आई। आवा की प्रेजिडेंट होने के नाते मेरे लिए बहुत काम होगा। मैंने सबसे कहूंगी कि इस काम में मेरी मदद करें। जब समय मिलेगा जनरल रावत पद संभालने के बाद अपने गांव जायेंगे।

Lt Gen Bipin Rawat with DG Coast Guardदेवभूमि ही नहीं देश के मानचित्र पर उत्तराखंड का पौड़ी जिला बेहद खास हो गया है। इसकी वजह है कि देश की सुरक्षा में टॉप तीन पदों पर यहीं की शख्सियतें तैनात हैं। एनएसए अजित डोभाल, थल सेना प्रमुख की जिम्मेदारी संभालने जा रहे जनरल बिपिन रावत और रॉ चीफ अनिल धस्माना पौड़ी गढ़वाल से ही ताल्लुक रखते हैं। अजित डोभाल पौड़ी के घीड़ी गांव, बिपिन रावत यहां के सैंण गांव और रॉ चीफ धस्माना तोली गांव के रहने वाले हैं। हम आपको देश के नए सेनापति जनरल बिपिन रावत के कुछ उन अनछुए पहलुओं से वाकिफ कराते हैं जो देश और दुनिया के सामने नहीं हैं।

गढ़वाल रेजिमेंट का रेजिमेंटल सेंटर लैन्सडाउन भारतीय सेना का सबसे पुराने सेंटर में से एक है। इसकी स्थापना 1887 में अंग्रेजों ने की थी। यहां से हर साल हजारों की संख्या में गढ़वाली जवान सेना में तैनात होते हैं। जनरल बिपिन रावत के आर्मी चीफ बनने का इतिहास यहीं से शुरू होता है। उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल लक्ष्मण सिंह रावत लैन्सडाउन सेंटर में गढ़वाल रेजिमेंट में जवान में रूप में भर्ती हुए। उसके बाद कड़ी ट्रेनिंग और मेहनत के बल पर उन्होंने गोरखा रेजिमेंट में अधिकारी के तौर पर कमीशन लिया। ले जनरल लक्षमण सिंह रावत अकेले ऐसे अधिकारी हैं जो गढ़वाल रेजिमेंट में सिपाही भर्ती होने के बाद सेना में डिप्टी चीफ के पद तक पहुंचे।

भारत का इतिहास उत्तराखंड के वीरों के अनुपम शौर्य एवं गौरवशाली सैनिक परम्पराओं तथा बलिदान की गाथाओं से भरा पड़ा है। विपरीत परिस्तिथियों में संघर्ष करने की शक्ति गढ़वालियों की विशेषता रही है। जनरल बिपिन रावत ने उसी गढ़वाली परम्परा को आगे बढ़ाया है। उनके सेना प्रमुख बनने से गढ़वाल रेजिमेंट के लैन्सडाउन सेंटर में ट्रेनिंग कर रहे रंगरूटों में जबरदस्त उत्साह है। अब आपको दिखाते हैं कैसे गढ़वाल का एक आम युवक सैनिक में तब्दील होता है। एक साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद एक आम युवा जांबाज सैनिक में तब्दील होता है।

Gen Bipin Rawat, VCOASअपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए लेफ्टिनेंट जनरल विपिन रावत इस पद पर पहुंचे हैं। इससे पहले उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल लक्ष्मण सिंह रावत सेना में डिप्टी चीफ के पद से रिटायर हुए थे। सेना प्रमुख की जिम्मेदारी संभालने जा रहे बिपिन रावत का पौड़ी जिले के सैंण गांव में पैतृक घर है। यहां पर उनके चाचा भरत सिंह रावत और उनका परिवार रहता है। उत्तराखंड के पौड़ी जिले द्वारीखाल ब्लॉक में बिरमोली ग्राम पंचायत के अंतर्गत सैंण गाँव आता है।

जनरल बिपिन रावत के घर तक पहुंचने के लिए एक किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना पड़ता है। उत्तराखंड राज्य के 16 साल होने के बाद भी उनका गांव सड़क जैसी मूलभूत सुविधा से अछूता है। उनके चाचा और चाची अपने भतीजे की सफलता से फूले नहीं समा रहे हैं। चाचा भरत सिंह बताते हैं कि बिपिन का परिवार दशकों पहले बाहर शिफ्ट हो गया था, लेकिन उन्हें अपने पैतृक गांव सैंण से इतना लगाव है कि आज भी वह यहां आते रहते हैं। उनके इसी मिलनसार व्यवहार का पूरा गांव कायल हैं और बिपिन को यहां के लोग याद करते हैं। तीन साल पहले जनरल बिपिन रावत अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के साथ गाँव में पूजा में शामिल होने आये थे।

उनके चाचा भरत सिंह भी सेना में हवलदार के पद पर रहे हैं। चाची सुशीला देवी का कहना है कि उन्हें बहुत खुशी है बेटा इतने बड़े पद पर पहुंचा है। 31 दिसम्बर को जब बिपिन रावत सेना की कमान संभालेंगे तो उनके इस पैतृक घर में पूजा की जायेगी साथ ही नाते रिश्तेदारों और गांव में मिठाई बांटी जायेगी। बिरमोली के ग्राम पंचायत के प्रधान धर्मपाल सिंह बिष्ट का कहना है, बिपिन रावत की इस उपलब्धि पर पूरे उत्तराखंड को गर्व है। इलाके के लोग उनको प्रेरणास्रोत मानते हैं। उनसे प्रेरणा लेकर देवभूमि के और भी लाल आगे बढ़ेंगे।

Lansdownले. जनरल बिपिन रावत आर्मी चीफ के पद पर पहुंचने वाले उत्तराखंड के दूसरे अधिकारी हैं। इससे पहले जनरल बिपिन चन्द्र जोशी सेना प्रमुख बने थे। शिमला के सेंट एडवर्ड स्कूल के पूर्व छात्र रहे जनरल रावत ने वर्ष 1978 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून से पास आउट होने के बाद उन्हें 11वीं गोरखा राइफल्स की पांचवीं बटालियन में कमीशन मिला। जनरल रावत का करियर उपलब्धियांे भरा रहा है। वह दिसंबर 1978 में भारतीय सैन्य अकादमी से पासआउट होने वाले बैच के श्रेष्ठतम कैडेट रहे और उन्हें स्वार्ड ऑफ ऑनर मिला। लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत अति विशिष्ट सेवा मेडल, युद्ध सेवा मेडल, सेना मेडल व विशिष्ट सेवा मेडल जैसे कई सम्मान से अलंकृत किए गए हैं।

बेशक उत्तराखंड देश का छोटा राज्य है लेकिन इस छोटे से राज्य के लाल देश की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। देश की सुरक्षा से जुड़े अहम पदों पर उत्तराखंडवासियों को तैनाती मिली है। देश सेवा और बहादुरी का जज्बा उत्तराखंड की मिट्टी में है। यही कारण है कि देश की सुरक्षा के लिए सेना में भर्ती होने की बारी हो या फिर देश के लिए सीने पर गोली खाकर शहादत देने का मौका, उत्तराखंडी हर जगह आगे खड़े मिलते है।

मनजीत नेगी

This entry was posted on Saturday, December 24th, 2016 at 5:12 pm and is filed under समाचार, हमारी फ़ौज. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

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