बग्वाल में इस साल फल-फूल बरसे

bagwal1देवीधूरा में वाराही देवी मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष रक्षाबन्धन के अवसर पर श्रावणी पूर्णिमा को पत्थरों की वर्षा का एक विशाल मेला लगता है। मेले की ऐतिहासिकता कितनी प्राचीन है इस विषय में मत-मतान्तर हैं। लेकिन आम सहमति है कि नह बलि की परम्परा के अवशेष के रुप में ही बग्वाल का आयोजन होता है। लोक मान्यता है कि किसी समय देवीधूरा के सघन बन में बावन हजार वीर और चैंसठ योगनियों के आतंक से मुक्ति देकर स्थानीय जन से प्रतिफल के रुप में नर बलि की मांग की, जिसके लिए निश्चित किया गया कि पत्थरों की मार से एक व्यक्ति के खून के बराबर निकले रक्त से देवी को तृप्त किया जायेगा तथा पत्थरों की मार प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को आयोजित की जाएगी। इस प्रथा को आज भी निभाया जाता है।

इस साल देवीधूरा की विख्यात बग्वाल के एक लाख से अधिक लोग साक्षी बने। बग्वाल में इतिहास ने करवट भी बदली और पुरानी परम्परा भी बरकरार रही। तमाम कोशिशों के बावजूद प्रशासन तथा मंदिर कमेटी की कसरत का अपेक्षित परिणाम नहीं निकला। पहले युद्धवीरों ने फल और फूलों और अंतिम क्षणों में युवा युद्धवीरों ने पत्थरों की बारिश कर सदियों से चली आ रही परम्परा को भी जीवंत रखा। बग्वाल में इस बार 80 से अधिक युद्धवीर घायल हुए।

Bagwal 2बग्वाल में फल-फूलों की बौछारों ने इतिहास में जगह बना ली। पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी ने परम्पराओं को छेड़ने के मामले में सावधानी बरतने को कहा है जबकि पूर्व सीएम नारायण दत्त तिवारी ने फल और फूल की बग्वाल शुरू कराने के लिए मंदिर कमेटी संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगड़िया को बधाई दी है। बग्वाल में शांति व्यवस्था के लिए पूरे दिन संगीनों का साया रहा। इस बार बग्वाल में सात मिनट फूल और फल और तीन मिनट पत्थरों से युद्ध हुआ। इसमें एक हजार से अधिक युद्धवीरों ने भाग लिया। 21 अगस्त को मां बाराही मंदिर के ऐतिहासिक खोलीखाड़, दुवाचैड़ मैदान में बग्वाल को देखने के लिए कुमाऊं के विभिन्न इलाकों समेत देश के विभिन्न हिस्सों से लोगों की भीड़ उमड़ी थी।

इस साल सुबह से ही बग्वाल को लेकर लोगों में काफी कौतूहल के साथ ही चिंता भी सता रही थी जबकि चार खाम और सात थोकों के युद्धवीर अपनी परम्परा का निर्वहन करने के लिए 12 बजे से मां बाराही दवी मंदिर में आने शुरू हो गए थे। सदियों पुरानी परम्परानुसार सबसे पहले गहड़वाल खाम के युद्धवीरों ने मंदिर की परिक्रमा की। इसके बाद वालिक खाम के युद्धवीरों ने परम्परा का निर्वहन किया। तीसरे चरण में चम्याल खाम के युद्धवीरों ने मंदिर की परिक्रमा की और रणभूमि में प्रवेश किया जबकि अंत में लमगड़िया खाम के युद्धवीर आए और परिक्रमा के बाद मैदान में चले गए। इस प्रक्रिया में करीब दो घंटे से अधिक का वक्त लगा।

युद्धवीरों के मंदिर में आने से पहले दूसरे हजारों लोगों ने मां बाराही के दर्शन किये। दर्शनों के लिए बग्वाल शुरू होने तक लंबी कतारें लगी रहीं। दोपहर तक सारी पूजा प्रक्रिया संपन्न होने के बाद मंदिर के पुजारी कीर्तिबल्लभ ने बग्वाल का शंखनाद किया। इस समय घड़ी 2.13 बजा रही थी। इसके साथ ही चारों खामों के युद्धवीर खोलीखाड़, दुवाचैड़ मैदान में एकत्र हो गए और परम्परानुसार चार खाम के लोग दो धड़ों में बंट गए। इनमें वालिक खाम और लमगड़िया खाम के युद्धवीर पूरब की ओर से और चम्याल खाम तथा गहड़वाल खाम के युद्धवीर पश्चिम की दिशा की ओर बग्वाल खेलने के लिए तैयार हो गए। कुछ ही पलों बाद यानी 2 बजकर 14 मिनट पर दोनों ओर से फूल और फल की बग्वाल शुरू हो गयी।

Bagwal 3युद्धवीरों ने फल और फूल की बग्वाल में हजारी, गुलाब के साथ ही नासपाती का प्रयोग किया। यह सिलसिला करीब सात मिनट तक चला। इस बीच पुरानी परम्परा को बरकरार रखने के लिए आतुर दोनों पक्षों के युवाओं ने पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। इसे रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन की सारी तैयारियां धरी रह गयी। करीब तीन मिनट तक दोनों ओर से जमकर पत्थरों की बारिश हुई और 80 से अधिक युद्धवीर घायल हो गए। ठीक 2 बजकर 23 मिनट पर पुजारी ने बग्वाल के समापन की घोषणा की। इससे आधुनिक परम्परा की शुरुआत भी हो गयी और पुरानी परम्परा भी बरकरार रही।

पत्थरों की बारिश के दौरान बग्वाल देखने आयी अनियंत्रित भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को काफी मेहनत करनी पड़ी। मैदान के चारों ओर रस्सी की बैरिकेडिंग लगायी गयी थी और कुछ क्षण ऐसे भी आये जब लोग रस्सी की बैरिकेडिंग को तोड़ने की कोशिश करने लगे, लेकिन तब तक बग्वाल संपन्न हो गयी और जयकारे के साथ लोग अपने घरों की ओर निकलने लगे। वैसे देवीधूरा का वैसर्गिक सौन्दर्य भी मोहित करने वाला है, इसीलिए भी बग्वाल को देखने दूर-दूर से सैलानी देवीधूरा पहँचते हैं।

हिलमेल ब्यूरो

Post Author: Hill Mail

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