शिवलोक की सीढ़ी: पातालभुवनेश्वर

मध्य हिमालय की सुंदर घाटियों में बसे भूभाग उत्तराखण्ड का सुरम्य अंचल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक विश्वासों के लिए प्रसिद्ध है। इसीलिए इसे देवभूमि कहा जाता है। इस पावन धरती के गर्भ में ऐसी आश्चर्यजनक गुफायें और मंदिर हैं जो हजारों सालों के पौराणिक इतिहास को समेटे हैं। ऐसे ही एक पौराणिक स्थान पातालभुवनेश्वर की रोमांचक यात्रा पर हम आपको लिए चलते हैं। यहां गुफा में जाने का रास्ता धरातल से नीचे की ओर जाता है इसीलिए इसे पाताल कहा जाता है।

पिथौरागढ़ जिले में सरयू और रामगंगा के बीच में स्थित है पातालभुवनेश्वर। यहां पंहुचने के लिए हमनें अपनी यात्रा हल्द्वानी से शुरू की। पूरा रास्ता उंचे पहाड़ों और घने चीड़ और देवदार के जंगल से घिरा है। समुद्र तल से पातालभुवनेश्वर की उंचाई 1350 मीटर है। रास्ते में अल्मोड़ा पड़ता है। अल्मोड़ा पूरे कुमांऊ क्षेत्र का व्यापारिक केंद्र है। सफर आगे बढ़ता है तो रास्ते में गोलू देवता का मंदिर मिलता है। गोलू देवता को इस इलाके में न्याय का देवता कहते हैं। जब लोगों को कहीं से न्याय नहीं मिलता है तो लोग गोलू देवता की शरण में आते हैं। लोग चिट्ठियों के रूप में अपनी समस्या और मूराद गोलू देवता के सामने रखते हैं। मन्नत पूरी होने पर लोग गोलू देवता के मंदिर में घंटियां बांधते हैं।

सफर और आगे बढ़ा तो जागेश्वर में प्रसिद्ध महामृत्युंजय शिव मंदिर पड़ता है। इस मंदिर को भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है। देवदार के घने वृक्षों के बीच यहां 124 मंदिरों का समूह है। हिमालय को भगवान शिव का विचरण स्थल माना जाता है। जागेश्वर के इस महामृत्युंजय मंदिर के बारे में मान्यता है कि अगर कोई इंसान मौत की गोद में बैठा हो और अगर वो यहां दर्शन के लिए आता है तो उसे नया जीवन मिल जाता है। आखिरकार करीब 12 घंटे का सफर तय करके हम गंगोलीहाट स्थित पातालभुवनेश्वर पंहुचे। पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान शिव ने सतयुग में तपस्या के लिए पातालभुवनेश्वर गुफा को बनाया था। कलयुग में आदि शंकराचार्य ने इसकी पुनरू प्राण प्रतिष्ठा की।

गुफा में प्रवेश करने के लिए 82 सीढ़ियों  का सहारा लेना पड़ता है। अंदर आक्सीजन की कमी होती है इसीलिए कमजोर दिल के लोगों के लिए बाहर चेतावनी लिखी गई है। पातालभुवनेश्वर की इस पौराणिक गुफा का रहस्य जानने के लिए मैंने यहां के पुजारी नीलम सिंह भण्डारी से बातचीत की। उन्होंने हमें गुफा में अंदर ले जाकर सारा रहस्य समझाया। गुफा के प्रवेशद्वार पर शेषनाग की फन उठाई आकृति है। माना जाता है कि शेषनाग ईश्वर की आज्ञा के बिना किसी को भी गुफा में प्रवेश नहीं करने देते हैं। गुफा के अंदर चार द्वार हैं। जिन्हें चार युगों का द्वार कहा जाता है। माना जाता है कि सतयुग के अंत में पाप का द्वार बंद हो चुका है। द्वापर के अंत में रणद्वार बंद हुआ और अब केवल धर्म और मोक्ष द्वार ही खुले हुए हैं। गुफा के मुख्य भाग में भगवान शिव की आधी जटायें हैं जिसमें भागीरथी समायी हुई हैं। इसके नीचे 33 करोड़ देवी-देवता स्नान कर रहे हैँ।

कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने अपनी कैलाशमानसरोवर की यात्रा के समय यहां पर शिवलिंग के उपर ताम्रपात्र की स्थापना की थी। क्योंकि यहां शिवलिंग प्रकाशयुक्त था इसके पास कोई मनुष्य नहीं जा सकता था। शिवलिंग के प्रकाश से आदमी की आंखों की रोशनी जा सकती थी। पातालभुवनेश्वर गुफा के अंदर पाण्डवों के स्वर्गारोहण का रास्ता भी दिखाया गया है। पातालभुवनेश्वर की गुफा का आश्चर्यलोक को इसके अंदर जाकर ही महसूस किया जा सकता है। मेरे लिए पातालभुवनेश्वर का ये अनुभव अपने आप में किसी नये लोक की अनुभूति से कम नहीं था।

Post Author: Hill Mail

2 thoughts on “शिवलोक की सीढ़ी: पातालभुवनेश्वर

    shashi kant

    (June 1, 2012 - 12:33 am)

    thanks for giving information i like this article

    ATUL PANT

    (April 7, 2017 - 2:44 pm)

    great info
    a little bit peoples know about the real truth of patal bhubaneshwar.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *