कंडाली का डंक गुजरे जमाने की बात ?

पहाड़ों की परंपरा और रीतिरिवाजों से जुड़ी वन औषधि कंडाली विलुप्त होती जा रही है। बिच्छु घास के नाम से प्रसिद्ध इस औषधि पर ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। आम तौर पर दो वर्ष की उम्र वाली बिच्छू घास को गढ़वाल में कंडाली व कुमाऊं में सिसूण के नाम से जाना जाता है।

अर्टिकाकेई वनस्पति परिवार के इस पौधे का वानस्पतिक नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा है। बिच्छू घास की पत्तियों पर छोटे-छोटे बालों जैसे कांटे होते हैं। पहाड़ी परिवेश में पले-बढ़े ऐसे कम ही लोग होंगे जो कंडाली के नाम से परिचित न हों। पत्तियों के हाथ या शरीर के किसी अन्य अंग में लगते ही उसमें झनझनाहट शुरू हो जाती है। जो कंबल से रगड़ने या तेल मालिश से ही जाती है। अगर उस हिस्से में पानी लग गया तो जलन और बढ़ जाती है। इसका असर बिच्छु के डंक से कम नहीं होता है। इसीलिए इसे बिच्छु घास भी कहा जाता है।

बचपन में पढ़ाई न करने पर मास्टरजी बच्चों को कंडाली से डराते थे। बचपन में कंडाली की मार का अनुभव मुझे आज भी याद है। कंडाली का एक और बड़ा गुण जो पहाड़ के लोगों को मालूम है वो है उसका साग जो खाने में इतना स्वादिष्ट की आज भी भुलाये नहीं भूलता। कंडाली के साग के साथ झुंगर का मजा लेकिन ये अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। कुछ साल पहले जब भी दिल्ली से पहाड़ अपने गांव जाता तो कंडाली के साग का मजा जरूर लेता था।

ऋषिकेश से मेरे मित्र प्रबोध उनियाल जी ने कंडाली के बारे में बताया कि औषधीय गुणों से भरपूर इस पौधे का खासा महत्व है। बिच्छू घास का प्रयोग तंत्र-मंत्र से बीमारी भगाने, पित्त दोष, गठिया, शरीर के किसी हिस्से में मोच, जकड़न और मलेरिया के इलाज में तो होता ही है, इसके बीजों को पेट साफ करने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। माना जाता है कि बिच्छू घास में काफी आयरन होता है। इस पर जारी परीक्षण सफल रहे तो उससे जल्द ही बुखार भी भगाया जा सकेगा।

वैज्ञानिक इससे बुखार भगाने की दवा तैयार करने में जुटे हैं। ये वन औषधि उत्तरी कटिबंध इलाकों में प्राकृतिक रूप से पैदा होती है। भारत, चीन, यूरोप समेत कई देशों में पाई जाने वाले इस पौधे की दुनियाभर में पचास से ज्यादा प्रजातियां हैं। गलोबल वार्मिंग और मौसम की मार ने जहां पहाड़ के जलस्रोतों पर असर डाला वहीं इसका अस्तित्व खतरे में है। पहाड़ों में जहां असंख्य वन औषधियों से युक्त पेड़-पौधे हैं। वहीं कंडाली का अपना खास स्थान है। हम सबको मिलकर सोचना होगा कि कंडाली को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं। जीवन की भागमभाग में हम सबको कंडाली के डंक और साग दोनों की जरूरत है।

This entry was posted on Monday, April 30th, 2012 at 6:47 pm and is filed under रंग-तरंग. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

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