लाखामण्डल: सवा लाख शिव

रहस्य, रोमांच और पौरणिक यात्रा का दूसरा नाम है लाखामण्डल। महाभारत काल में दुर्योधन ने पाण्डवों को जला डालने के लिए लाक्षागृह बनाया था। तभी इस स्थान का नाम लाखामण्डल पड़ा। लाखामण्डल पहुंचने के लिए हमनें देहरादून से अपनी यात्रा शुरू की। देहरादून जिले की चकराता तहसील का जौनसार बाबर इलाका अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है। देहरादून से लाखामण्डल पहुंचने के दो रास्ते हैं। यमुनोत्री जाने वाले मार्ग पर देहरादून से मसूरी होते हुए लाखामण्डल पहुंच सकते हैं। जबकि देहरादून से विकासनगर होते हुए करीब 150 किलोमीटर का सफर तय करके लाखामण्डल पहुंचा जा सकता है। हमनें विकासनगर से अपना सफर आगे बढ़ाया। जैसे-जैसे हमारा सफर आगे बढ़ा हर तरफ कुदरत का सौंदर्य बिखरा पड़ा दिख रहा था। उंचे पहाड़ों से गिरते झरने बरबस ही रूकने को मजबूर करते हैं। रास्ता पहाड़ी था और भारी बारिश के कारण मुश्किलें और बढ़ गई। जगह-जगह भूस्खलन से रास्ते और सड़कें टूट गई हैं।

आगे सफर और मुश्किलों से भरा था। भूस्खलन से सड़क पूरी तरह बंद हो गई। कई घंटों के इंतजार के बाद सड़क खुल पाई। सफर आगे बढ़ता गया तो कुदरत के नजारे और खूबसूरत होते गये। हमारा पहला पड़ाव चकराता था। चकराता एक हिल स्टेशन है। समंदर से करीब 7 हजार फीट की उंचाई पर बसे चकराता में मौसम हमेशा सुहाना रहता है। सैन्य छावनी होने के कारण चकाराता में विदेशी पर्यटकों के आने की मनाही है। आगे बढ़ते गये तो यमुनोत्री का तेज बहाव बा-बार ध्यान अपनी ओर खींचता है। यहां पर यमुना को देखकर दिल्ली में यमुना की बदहाली पर आपका दिल भर आयेगा। यहां यमुना के दाहिने तट पर उत्तर में ऋषिमाला और दक्षिण में गोमती संगम बनाती है। इसी के मध्य में लाखामण्डल है। आखिरकार दो दिन का कठिन सफर तय करके हम लाखामण्डल पहुंचे।

यमुना नदी के किनारे बसे लाखामण्डल का पूरा इलाका चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा है। छत्र शैली का बना मुख्य मंदिर चारों तरफ से सवा लाख शिवलिंगों से घिरा हुआ है। मंदिर के चारों तरफ शिवलिंग ही शिवलिंग नजर आते हैं। लाखामण्डल को पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में लिया हुआ है। यहां पर रहने वाले महाराज विरोचन गिरि जी ने बताया कि लाखामण्डल में पाण्डवों के अज्ञातवास और लाक्षागृह की कहानी और सवालाख शिवलिंगों का संगम है। यहां पर शिव, पाण्डव, विष्णु और परशुराम के मंदिर हैं। मंदिर के प्रांगण में दो बड़े शिवलिंग हैं। जिनमें एक को केदरालिंग और दूसरे को युधिष्ठिर लिंग कहा जाता है। युधिष्ठिर लिंग के चारों तरफ उनके चारों भाइयों अर्जुन,भीम.नकुल और सहदेव के शिवलिंग हैं।

लाखामण्डल के ठीक नीचे से होते हुए 1500 मीटर लंबी सुरंग यमुना के तट पर निकलती है। इसी सुरंग से पाण्डव लाक्षागृह से बचकर निकले थे।  दुर्योधन ने पाण्डवों  को जिंदा जलाने के लिए अपने विश्वासपात्र पुरोचन से वरुणावत में तेल, घी, चर्बी और लीसा मिलाकर लाक्षागृह बनवाया था। स्थानीय लोगों  के मुताबिक पाण्डव गुफा में कई पौराणिक अवशेष मौजूद हैं। हालांकि समय के साथ गुफा की देखरेख ने होने से ये अवशेष गुम होते जा रहे हैं।

कहा जाता है कि लाखामण्डल के पौराणिक मंदिर की खोज एक गाय ने की जो सालों पहले हर रोज यहां शिवलिंग पर दूध चढ़ाने आती थी। लाखामण्डल में हर रोज मुख्य पुजारी पारंपरिक आरती और ढोल-नगाड़ों के साथ शिव और उनके पूरे परिवार समेत पाण्डवों का आह्वान करते हैं। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव अपने पूरे परिवार के साथ  मौजूद हैं। सवालाख शिवलिंगों के रहस्य का पता करने पर महाराज विरोचन गिरि जी ने हमें बताया कि सालों पहले लोग लाखामण्डल में अपने पुरखों की याद में शिललिंगों की स्थापना करते थे। पाण्डवों के वंशज राजा जनमेजय ने भी पाण्डवों के लिए यहां शिवलिंगों की स्थापना की।

आज भी जौनसार बाबर के जनजातीय इलाकों के ये लोग लाखामण्डल में पाण्डवों के संकट के दिनों में रहने से संबधित लोकगीत गाते हैं। पाण्डवों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज भी जौनसार बाबर में बहुपति प्रथा कायम है। महिलाओं पर यहां सारी घर-गृहस्थी निर्भर करती है। यहां के कठिन हालातों में स्थानीय लोग पाण्डलकालीन धरोहर को बचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। हालांकि समय के साथ विकास की दौड़ में पिछड़ते लोगों की असल उम्मीद सरकार से है।

Post Author: Hill Mail

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